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सोमा॑पूषणा॒ रज॑सो वि॒मानं॑ स॒प्तच॑क्रं॒ रथ॒मवि॑श्वमिन्वम्। वि॒षू॒वृतं॒ मन॑सा यु॒ज्यमा॑नं॒ तं जि॑न्वथो वृषणा॒ पञ्च॑रश्मिम्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

somāpūṣaṇā rajaso vimānaṁ saptacakraṁ ratham aviśvaminvam | viṣūvṛtam manasā yujyamānaṁ taṁ jinvatho vṛṣaṇā pañcaraśmim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सोमा॑पूषणा। रज॑सः। वि॒ऽमान॑म्। स॒प्तऽच॑क्रम्। रथ॑म्। अवि॑श्वऽमिन्वम्। वि॒षु॒ऽवृत॑म्। मन॑सा। यु॒ज्यमा॑नम्। तम्। जि॒न्व॒थः॒। वृ॒ष॒णा॒। पञ्च॑ऽरश्मिम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:40» मन्त्र:3 | अष्टक:2» अध्याय:8» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:2» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अग्नि और वायु के गुणों को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (वृषणा) बलिष्ठ वायु और अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वानो ! तुम (सोमापूषणा) अग्नि और वायु (रजसः) लोकसमूह के (अविश्वमिन्वम्) जिससे अविद्यमान समस्त पदार्थों को अलग करते हैं जो (विषूवृतम्) व्यापक गमन से ढपा हुआ (सप्तचक्रम्) जिसमें सात चक्र (पञ्चरश्मिम्) तथा पाँच प्राण-अपान-व्यान-उदान और समान रश्मि के तुल्य विद्यमान (मनसा) जो अन्तःकरणस्थ विचार से (युज्यमानम्) युक्त किया जाता उस (विमानम्) आकाश में गमन करानेवाले (रथम्) रमणीय यान को (जिन्वथः) चलाते हैं (तम्) उसको जानो ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि अन्तरिक्ष में गमन करानेवाले सात कलायन्त्र घुमाने के जिसमें निमित्त, ऐसे शीघ्र गमन करानेवाले रथ को बनाकर सुख पावें ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अहुत शरीर-रथ

पदार्थान्वयभाषाः - १. (वृषणा) = शक्तिशाली व सब सुखों का वर्षण करनेवाले (सोमापूषणा) = सोम व पूषन् तत्त्व सौम्यता तथा तेजस्विता (तं रथम्) = उस शरीररूप रथ को (जिन्वथ) = हमें देते हैं-हमारे प्रति प्रेरित करते हैं [अस्मान् प्रति प्रेरयथः सा०] जो कि (रजसः विमानम्) = रजोगुण के विशिष्ट मानवाला है–जिसमें रजोगुण का बड़ा सुन्दर सम्मिश्रण है। (सप्तचक्रम्) = जो रस-रुधिर-मांस-अस्थि मज्जामेदस् व वीर्य नामक सात धातुरूप सात चक्रोंवाला है। (अविश्वमिन्वम्) = जो विश्व का अपरिच्छेद्य है [विश्वस्यापरिच्छेद्यम्]- जिसे पूरा-पूरा समझना बड़ा कठिन है अथवा जो उस सर्वत्र प्रविष्ट प्रभु का हिंसन करनेवाला नहीं, अर्थात् प्रभु का विस्मरण करनेवाला नहीं है। २. जो रथ (विषूवृतम्) = विविध उत्तम क्रियाओं में वर्तनवाला है। मनसा (युज्यमानम्) = मन से युक्त हो रहा है- मन जिसमें घोड़ों की लगाम के स्थानापन्न है। (पञ्चरश्मिम्) = पाँच ज्ञानेन्द्रियों की रश्मियोंवाला है- पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जिसमें प्रकाश करनेवाली हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम व पूषा का समन्वय होने पर यह शरीर-रथ अत्यन्त उत्तम बनता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निवायुगुणानाह।

अन्वय:

हे वृषणा वाय्वग्निवद्वर्त्तमानौ विद्वांसौ युवां सोमापूषणा रजसोऽविश्वमिन्वं विषूवृतं सप्तचक्रं पञ्चरश्मिं मनसा युज्यमानं विमानं रथं जिन्वथः प्रापयतस्तं विजानीत ॥३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमापूषणा) अग्निवायू (रजसः) लोकसमूहस्य (विमानम्) वियतिगमकम् (सप्तचक्रम्) सप्तचक्राणि यस्मिँस्तम् (रथम्) रमणीयं यानम् (अविश्वमिन्वम्) अविद्यमानानि विश्वानि मिन्वन्ति येन तम् (विषूवृतम्) विषुणा व्यापकेन गमनेन वृतम् (मनसा) अन्तःकरणेन विचारेण (युज्यमानम्) (तम्) (जिन्वथः) गमयतः (वृषणा) बलिष्ठौ (पञ्चरश्मिम्) पञ्च प्राणाऽपानव्यानोदानसमाना रश्मय इव यस्मिँस्तम् ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैरन्तरिक्षे गमयितारं सप्तकलायन्त्रभ्रामणनिमित्तं सद्यो गमयितारं रथं कृत्वा सुखमाप्तव्यम् ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma and Pusha, fire and air, all-invigorating powers, create, animate and refresh that aerial chariot with seven chakras (circles and centres of energy) and five controls for the people it traverses the spaces and goes all over in all directions but is not perceived everywhere and it can be controlled with the mind.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The properties of the fire and air are told.

अन्वय:

O learned persons ! you are showerers f happiness like the fire and air. You should know well about that charming vehicle (in the form of an aircraft) which is seven wheeled, which has five reins in the form of Prana, Apana, Vyana, Udana and Samana, which drive away all impurities of the body and do not harm any beings, A thoughtful mind harnesses it. The same mind goes to the distant places including the sky.

भावार्थभाषाः - Men should enjoy happiness by manufacturing thoughtfully, the vehicles (aircrafts) which can go to the sky and distant places quickly. It should be harnessed with seven machines to be moved methodically.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - माणसांनी अंतरिक्षात गमन करविणाऱ्या सात यंत्रांना फिरवून तात्काळ गमन करणारे रथ तयार करून सुखी व्हावे. ॥ ३ ॥