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अ॒स्मभ्यं॒ तद्दि॒वो अ॒द्भ्यः पृ॑थि॒व्यास्त्वया॑ द॒त्तं काम्यं॒ राध॒ आ गा॑त्। शं यत्स्तो॒तृभ्य॑ आ॒पये॒ भवा॑त्युरु॒शंसा॑य सवितर्जरि॒त्रे॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asmabhyaṁ tad divo adbhyaḥ pṛthivyās tvayā dattaṁ kāmyaṁ rādha ā gāt | śaṁ yat stotṛbhya āpaye bhavāty uruśaṁsāya savitar jaritre ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्मभ्य॑म्। तत्। दि॒वः। अ॒त्ऽभ्यः। पृ॒थि॒व्याः। त्वया॑। द॒त्तम्। काम्य॑म्। राधः॑। आ। गा॒त्। शम्। यत्। स्तो॒तृऽभ्यः॑। आ॒पये॑। भवा॑ति। उ॒रु॒ऽशंसा॑य। स॒वि॒तः॒। ज॒रि॒त्रे॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:38» मन्त्र:11 | अष्टक:2» अध्याय:8» वर्ग:3» मन्त्र:6 | मण्डल:2» अनुवाक:4» मन्त्र:11


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सवितः) परमात्मन् ! (त्वया) आपने (दत्तम्) दिया हुआ (दिवः) प्रकाशमान लोक (अद्भ्यः) जलों और (पृथिव्याः) भूमि से (यत्) जो (काम्यम्) कामना करने योग्य (राधः) धन (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (आ,गात्) प्राप्त हो (तत्) वह (उरुशंसाय) बहुतों ने प्रशंसा किये हुए (जरित्रे) प्रशंसित (आपये) विद्या व्यापक के लिये और (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों के लिये (शम्) कल्याणरूप (भवाति) हो ॥११॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने प्रकृति से महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अहंकार, अहंकार से पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्राओं से एकादश इन्द्रियाँ और स्थूल पञ्चभूत और ओषधियाँ बनाईं, जिनसे सब प्राणियों का सुख होता है ॥११॥ इस सूक्त में ईश्वर, सूर्य, और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह अड़तीसवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रिलोकी का धन

पदार्थान्वयभाषाः - १. हे प्रभो ! (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (दिव:) = आकाश से (अद्भ्यः) = अन्तरिक्षस्थ जलों से तथा (पृथिव्याः) = इस पृथिवी से (तत्) = वह (राधः) = कार्यसाधक ऐश्वर्य (आगात्) = प्राप्त हो, जो कि (काम्यम्) = कमनीय व सुन्दर है - चाहने योग्य है । तथा त्वया दत्तम्-आपसे दिया गया है। द्युलोक से प्राप्त होनेवाला धन 'सूर्य का प्रकाश व सूर्यकिरणों से हमारे शरीरों में स्थापित की जानेवाली प्राणशक्ति है । अन्तरिक्ष से प्राप्त होनेवाला धन चन्द्र की ज्योत्स्ना व पर्जन्यों से बरसाये जानेवाली वृष्टि धाराएँ हैं। पृथिवी से प्राप्त होनेवाला धन विविध ओषधि वनस्पतियों व विविध धातुओं के रूप में है। ये सब धन काम्य व कार्यसाधक हैं । २. हे (सवित:) = सब ऐश्वर्यों के उत्पादक प्रभो ! हमें वह धन प्राप्त हो (यत्) = जो कि (स्तोतृभ्यः) = स्तवन करनेवालों के लिए (शंभवाति) = शान्ति को देनेवाला होता है तथा आपये मित्रों व बन्धुओं के लिए शान्ति का कारण होता है तथा उस (शंसाय) = खूब ही शंसन करनेवाले (जरित्रे) = [जरिता, गरिता नि० १.७] गुरु व उपदेष्टा के लिए भी शान्ति का कारण बनता है। हमें वह धन प्राप्त हो जिसमें स्तोताओं, बन्धुओं व गुरुओं का भी भाग हो। हम सारे धन को स्वयं ही खा जानेवाले न हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभुकृपा से हमें त्रिलोकी का कमनीय धन प्राप्त हो । उस धन में स्तोताओं, मित्रों व गुरुओं का भी भाग हो। प्रस्तुत सूक्त सूर्योदय के वर्णन से प्रारम्भ हुआ है और उस महान् सूर्य प्रभु से त्रिलोकी के धन की याचना के साथ समाप्त हुआ है 'इस त्रिलोकी के धन के सदुपयोग से हमारे प्राणापान अत्यन्त सुन्दर होंगे' इस भावना को अग्रिम सूक्त में व्यक्त करते हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ विद्वद्विषयमाह।

अन्वय:

हे सवितः परमात्मन् त्वया दत्तं दिवोऽद्भ्यः पृथिव्या यत् काम्यं राधोऽस्मभ्यमा गात् तदुरुशंसाय जरित्रे आपये स्तोतृभ्यश्च शं भवाति ॥११॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्मभ्यम्) (तत्) पूर्वोक्तं जलम् (दिवः) प्रकाशमानात् (अद्भ्यः) जलेभ्यः (पृथिव्याः) भूमेः (त्वया) (दत्तम्) (काम्यम्) कमनीयम् (राधः) धनम् (आ) (गात्) प्राप्नुयात् (शम्) सुखम् (यत्) (स्तोतृभ्यः) स्तावकेभ्यः (आपये) विद्याव्यापकाय (भवाति) भवेत् (उरुशंसाय) बहुभिः प्रशंसिताय (सवितः) (जरित्रे) अर्चिताय ॥११॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वरेण प्रकृत्या महान् महतोऽहङ्कारोऽहङ्कारात् पञ्चतन्मात्रास्ताभ्य एकादशेन्द्रियाणि स्थूलानि पञ्चभूतानि चौषधयो निर्मिताः। यैः सर्वेषां प्राणिनां सुखं सञ्जायत इति ॥११ अत्रेश्वरसूर्य्यविद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति अष्टत्रिंशत्तमं सूक्तं तृतीयो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Lord, whatever wealth has been given to us by you from the regions of light and the enlightened people, from the waters and the generous people, from the earth and motherly figures, whatever desired be achieved, may all that be good and blissful for the celebrants, the learned, the praiseworthy and, O Lord Savita, for the worshipful.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Further to Glory of God.

अन्वय:

O Savita (God, the creator of the world) ! may that desirable wealth which is granted to us by You proceeding from the sky, the waters and the earth be source of happiness to those who praise You sincerely, and to the devotees who are highly learned and therefore praised by many.

भावार्थभाषाः - God has made from Primordial matter the Mahat, from Mahat to Ahankar (ego principle), from Ahankar to five Tan Matras, from them eleven sense, (including mind ), gross five elements and herbs etc., by which the welfare of all living beings is established.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - परमेश्वराने प्रकृतीपासून महत्तत्त्व, महत्तत्त्वापासून अहंकार, अहंकारापासून पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्रांपासून अकरा इंद्रिये व स्थूल पंचभूत आणि औषधी उत्पन्न केलेली आहे. त्यापासून सर्व प्राण्यांना सुख मिळते. ॥ ११ ॥