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शुचि॑र॒पः सू॒यव॑सा॒ अद॑ब्ध॒ उप॑ क्षेति वृ॒द्धव॑याः सु॒वीरः॑। नकि॒ष्टं घ्न॒न्त्यन्ति॑तो॒ न दू॒राद्य आ॑दि॒त्यानां॒ भव॑ति॒ प्रणी॑तौ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śucir apaḥ sūyavasā adabdha upa kṣeti vṛddhavayāḥ suvīraḥ | nakiṣ ṭaṁ ghnanty antito na dūrād ya ādityānām bhavati praṇītau ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शुचिः॑। अ॒पः। सु॒ऽयव॑साः। अद॑ब्धः। उप॑। क्षे॒ति॒। वृ॒द्धऽव॑याः। सु॒ऽवीरः॑। नकिः॑। तम्। घ्न॒न्ति॒। अन्ति॑तः। न। दू॒रात्। यः। आ॒दि॒त्याना॑म्। भव॑ति। प्रऽनी॑तौ॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:27» मन्त्र:13 | अष्टक:2» अध्याय:7» वर्ग:8» मन्त्र:3 | मण्डल:2» अनुवाक:3» मन्त्र:13


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर कैसा राजा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो शुचिः पवित्र (अदब्धः) हिंसा अर्थात् किसी से दुःख को न प्राप्त हुआ राजा (सुयवसाः) जिनसे अच्छे जौ आदि अन्न उत्पन्न हों उन (पय:) जलों के (उप,क्षेति) निकट वसता है जो (वृद्धवयाः) बड़े जीवनवाला (सुवीरः) सुन्दर वीर पुरुषों से युक्त (आदित्यानाम्) पूर्ण ब्रह्मचर्य और विद्यावाले पुरुषों की (प्रणीतौ) उत्तम नीति में वर्त्तमान (भवति) होता है (तम्) उसको (नकिः) नहीं कोई (अन्तितः) समीप से (न) न (दूरात्) दूर से कोई (घ्रन्ति) मार सकते हैं ॥१३॥
भावार्थभाषाः - जो पवित्र आचरणवाला हिंसादि दोषों से रहित पूर्ण सामग्रीवाला दीर्घजीवी विद्वानों की रक्षा में सदा रहता, उसका समीपस्थ और दूरस्थ शत्रु लोग पराजय कदापि नहीं कर सकते ॥१३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जल व अन्न

पदार्थान्वयभाषाः - १. (शुचिः) = गतमन्त्र में वर्णित पवित्र जीवनवाला यह व्यक्ति (अपः) = जलों को तथा (सूयवसा:) = शोभन सस्यों को (अदब्धः) = अहिंसित होता हुआ (उपक्षेति) = खाकर जीवन धारण करता है [उप जीवति]। जलों और अन्नों का ही सेवन करता है उनका भी सेवन मात्रा में ही करता है ताकि वे इसे हिंसित करनेवाले न हों। इस प्रकार यह (वृद्धवयाः) = दीर्घ व उत्कृष्ट जीवनवाला बनता है। (सुवीरः) = उत्तम वीर होता है । २. (यः) = जो भी इस प्रकार (आदित्यानाम्) = देवों के (प्रणीतौ) = प्रणयन में होता है, अर्थात् देवों की तरह ही (हविर्भुक्) = होता है न कि पिशाच, (तम्) = उसको (नकिः अन्तितः) = न तो समीप से और (न दूरात्) = न दूर से (घ्नन्ति) = शत्रु मारनेवाले होते हैं। न आन्तरशत्रु उसे मार पाते हैं और न ही बाह्य-शत्रु ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मनुष्य देवों का अनुकरण करता हुआ जल पीये और अन्न खाये तो वह शत्रुओं के आक्रमण से बचा रहता है। मांसभोजन ही काम, क्रोध, लोभादि को जन्म देता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः कीदृशो राजा भवेदित्याह।

अन्वय:

यः शुचिरदब्धो राजा सुयवसा अप उपक्षेति। यो वृद्धवयाः सुवीर आदित्यानां प्रणीतौ वर्त्तमानो भवति तं नकिरन्तितो न दूरात् केऽपि घ्नन्ति ॥१३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (शुचिः) पवित्रः (अपः) जलानि (सूयवसाः) शोभनानि यवसानि याभ्यस्ताः। अत्र संहितायामिति दीर्घः (अदब्धः) अहिंसितः (उप) (क्षेति) उपनिवसति (वृद्धवयाः) वृद्धं वयो जीवनं यस्य सः (सुवीरः) शोभना वीरा यस्य सः (नकिः) न (तम्) (घ्नन्ति) हन्ति (अन्तितः) समीपतः (नः) (दूरात्) (यः) (आदित्यानाम्) पूर्णब्रह्मचर्यविद्यावताम् (भवति) (प्रणीतौ) प्रकृष्टायां नीतौ ॥१३॥
भावार्थभाषाः - यः पवित्राचरणो हिंसादिदोषरहितोऽलंसामग्रीक: चिरञ्जीवी विदुषां शासने सदा वर्त्तते तस्य समीपस्था दूरस्थाश्च शत्रवः पराजयं कर्त्तुं न शक्नुवन्ति ॥१३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The ruler, pure at heart, courageous and indomitable, who abides by the values, policies and guidance of Adityas, men of light, truth and justice, rules a long age, blest with noble children and followed by brave warriors, well-provided with plenty of food and water and doing noble acts of fame. None can hurt or damage or destroy him or his dominion either from far or near at hand.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of an ideal ruler are mentioned.

अन्वय:

The ruler who is pious, and not annoying to any one settles near the irrigation resources, where a good crop of food grains can be harvested, He enjoys longevity and follows. the policy of heroic and handsome persons, who follow strict celibacy and acquire knowledge. No body can hurt or kill him from adjacent or distant places.

भावार्थभाषाः - The ruler with clean conduct and character, never annoying or killing anyone without justification and equipped with all resources, can never be defeated by the adjacent or distant enemies.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जो पवित्र आचरण करणारा, हिंसा इत्यादी दोषांनी रहित पूर्ण सामग्रीयुक्त, दीर्घजीवी, विद्वानांचे सदैव रक्षण करणारा असतो, कोणताही शत्रू त्याचा कधी पराजय करू शकत नाही. ॥ १३ ॥