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य॒ज्ञेन॑ गा॒तुम॒प्तुरो॑ विविद्रिरे॒ धियो॑ हिन्वा॒ना उ॒शिजो॑ मनी॒षिणः॑। अ॒भि॒स्वरा॑ नि॒षदा॒ गा अ॑व॒स्यव॒ इन्द्रे॑ हिन्वा॒ना द्रवि॑णान्याशत॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yajñena gātum apturo vividrire dhiyo hinvānā uśijo manīṣiṇaḥ | abhisvarā niṣadā gā avasyava indre hinvānā draviṇāny āśata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य॒ज्ञेन॑। गा॒तुम्। अ॒प्ऽतुरः॑। वि॒वि॒द्रि॒रे॒। धियः॑। हि॒न्वा॒नाः। उ॒शिजः॑। म॒नी॒षिणः॑। अ॒भि॒ऽस्वरा॑। नि॒ऽसदा॑। गाः। अ॒व॒स्यवः॑। इन्द्रे॑। हि॒न्वा॒नाः। द्रवि॑णानि। आ॒श॒त॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:21» मन्त्र:5 | अष्टक:2» अध्याय:6» वर्ग:27» मन्त्र:5 | मण्डल:2» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - जो (गातुम्) पृथिवी को (अप्तुरः) प्राप्त हुए (अभिस्वरा) सब ओर की वाणियों और (निषदा) नित्य जो सभा में स्थित होते उनसे (गाः) पृथिवियों को (अवस्यवः) अपनी रक्षारूप माननेवाले (इन्द्रे) बिजली आदि पदार्थ में (हिन्वानाः) वृद्धि को प्राप्त होते (उषिजः) मनोहर (धियः) बुद्धियों को (हिन्वानाः) बढ़ाते हुए (मनीषिणः) मनीषी जन (यज्ञेन) यज्ञ से विद्या और सुन्दर शील को (विविद्रिरे) प्राप्त होते हैं वे (द्रविणानि) धन वा यशों को (आशत) प्राप्त होते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - कोई भी जन सत्संग-योगाभ्यास-विद्या और उत्तम बुद्धि के बिना पूर्ण विद्या और धन पाने को योग्य नहीं होता है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मार्गदर्शन व द्रविणप्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यज्ञेन) = उपासना के द्वारा [यज् देवपूजा] (गातुम्) = मार्ग को (विविद्रिरे) = जान पाते हैं। कौन ? [क] (अप्तुरः) = कर्मों को त्वरा से करनेवाले कर्मों को अपने अन्दर प्रेरित करनेवाले । [ख] (धियः हिन्वानाः) = बुद्धियों को अपने अन्दर प्रेरित करनेवाले। [ग] (उशिजः) = प्रभुप्राप्ति की कामना वाले [घ] (मनीषिणः) = बुद्धिमान्– बुद्धि द्वारा मन का शासन करनेवाले। ये लोग उपासना द्वारा हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा को सुनते हैं और अपने कर्तव्यमार्ग का ज्ञान प्राप्त करते हैं । २. ये (अवस्यवः) = रक्षण की कामनावाले (इन्द्रे) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु में (गाःहिन्वाना:) = स्तुतिवचनों को प्रेरित करते हुए (अभिस्वराः) = दिन के दोनों ओर प्रातः व सायं प्रभु के नामों का उच्चारण करने द्वारा तथा (निषदा) = प्रभु के चरणों में नम्रता से बैठने द्वारा [नि+सद्] (द्रविणा नि) = जीवनयात्रा को सुन्दरता से चलानेवाले धनों को (आशत) = व्याप्त करते हैं। इन धनों को प्राप्त करके वे सुन्दरता से जीवनयात्रा पूर्ण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ – उपासना के दो लाभ हैं [क] मार्गदर्शन [ख] द्रविणप्राप्ति ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

ये गातुमप्तुरोऽभिस्वरा निषदा गा अवस्यव इन्द्रे हिन्वाना उषिजो धियो हिन्वानो मनीषिणो यज्ञेन विद्यासुशीले विविद्रिरे ते द्रविणान्याशत ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञेन) सङ्गत्याख्येन (गातुम्) पृथिवीम् (अप्तुरः) प्राप्नुवन्तः (विविद्रिरे) लभन्ते (धियः) प्रज्ञाः (हिन्वानाः) वर्द्धयमानाः (उशिजः) कमितारः (मनीषिणः) मनस ईषिणः (अभिस्वरा) अभितः सर्वतः स्वरा वाणी तया। अत्र सुपां सुलुगिति डादेशः स्वर इति वाङ्नामसु निघं० १। ११ (निषदा) ये नित्यं सभायां सीदन्ति तैः। अत्रापि तृतीयाया डादेशः (गाः) पृथिवीः (अवस्यवः) आत्मनोऽवो रक्षामिच्छन्तः (इन्द्रे) विद्युदादिपदार्थे (हिन्वानाः) (द्रविणानि) धनानि यशांसि वा (आशत) प्राप्नुवन्ति ॥५॥
भावार्थभाषाः - नहि कश्चिदपि सत्सङ्गेन योगाभ्यासेन विद्यया प्रज्ञया विना पूर्णा विद्यां धनं च प्राप्तुमर्हति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Inspired pioneers, aspiring warriors and wise visionaries applying their thought, imagination and will in association, working with cooperation and united action in sustained yajna carve new paths of progress across the earth. Speaking together with a united voice, sitting together in assembly, acting together on the field for preservation and progress, exploiting natural energy and invoking the blessings of Indra in yajna, they reclaim lands of the earth and win wealths of the world.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The theme of scholars is further developed.

अन्वय:

Those who speak chosen words in the assembly and with people of this earth, they persistently add to their knowledge about the energy in their own interest. Thus, they multiply their wisdom and become sober and acquire learning and good behavior through the Yajnas. Such people earn reputation and wealth.

भावार्थभाषाः - The key to acquire learning and wealth is conditional if that person stays in the company of noble persons, practices Yoga and applies his wisdom.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - कोणतीही माणसे सत्संग, योगाभ्यास, विद्या व उत्तम बुद्धीशिवाय पूर्ण विद्या व धन प्राप्त करू शकत नाहीत. ॥ ५ ॥