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य॒ज्ञेन॑ वर्धत जा॒तवे॑दसम॒ग्निं य॑जध्वं ह॒विषा॒ तना॑ गि॒रा। स॒मि॒धा॒नं सु॑प्र॒यसं॒ स्व॑र्णरं द्यु॒क्षं होता॑रं वृ॒जने॑षु धू॒र्षद॑म्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yajñena vardhata jātavedasam agniṁ yajadhvaṁ haviṣā tanā girā | samidhānaṁ suprayasaṁ svarṇaraṁ dyukṣaṁ hotāraṁ vṛjaneṣu dhūrṣadam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य॒ज्ञेन॑। व॒र्ध॒त॒। जा॒तऽवे॑दसम्। अ॒ग्निम्। य॒ज॒ध्व॒म्। ह॒विषा॑। तना॑। गि॒रा। स॒म्ऽइ॒धा॒नम्। सु॒ऽप्र॒यस॑म्। स्वः॑ऽनरम्। द्यु॒क्षम्। होता॑रम्। वृ॒जने॑षु। धूः॒ऽसद॑म्॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:2» मन्त्र:1 | अष्टक:2» अध्याय:5» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:2» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब द्वितीय सूक्त का आरम्भ है। उसमें फिर अग्नि के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वान् जनो ! तुम (तना) विस्तृत (गिरा) वाणी से (वृजनेषु) जिन मार्गों में जन जाते हैं उनमें (धूर्षदम्) विमानादिकों की धुरियों को ले जाने तथा (होतारम्) पदार्थों को ग्रहण करनेवाले (समिधानम्) प्रचण्ड दीप्तियुक्त (सुप्रयसम्) सुन्दर मनोहर (द्युक्षम्) प्रकाशमान (स्वर्णरम्) सुख की प्राप्ति करानेहारे (जातवेदसम्) उत्तम होता है धन जिससे उस (अग्निम्) अग्नि को (हविषा) दान से (यजध्वम्) प्राप्त होओ और उस (यज्ञेन) यज्ञ से (वर्द्धत) बढ़ो ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य शिल्प-क्रिया से बिजुली आदि के रूप को यान-विमान आदि के कार्य्य में अच्छे प्रकार युक्त करें, वे ऐश्वर्य को प्राप्त हों ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'यज्ञेन- हविषा-तना-गिरा'

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यज्ञेन) = यज्ञ के द्वारा (जातवेदसम्) = सर्वव्यापक व सर्वज्ञ प्रभु का (वर्धत) = वर्धन करो । प्रभु का उपासन यज्ञ से ही तो होता है। 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः'। (अग्निम्) = उस अग्रणी प्रभु को (यजध्वम्) = पूजो, उसके साथ मेल करो व उसके प्रति अपना अर्पण करनेवाले बनो। यह पूजन (हविषा) = हवि के द्वारा होता है-दानपूर्वक अदन ही 'हवि' है । (तना) = शक्तियों के विस्तार के द्वारा यह पूजन होता है। 'तनु विस्तारे'='शरीर की शक्तियों का विस्तार करना' यह प्रभु का समुचित समादर है-प्रभु से दिये हुए शरीर को स्वस्थ रखना यह हमारा कर्त्तव्य है ही। (गिरा) = ज्ञान की वाणियों से यह आदर होता है। 'हविषा' शब्द हृदय की पवित्रता का संकेत करता है, 'तना' शरीर की शक्ति को बतलाता है तथा 'गिरा' मस्तिष्क की ज्ञानोज्ज्वलता का प्रतिपादक है। २. उस प्रभु का हम पूजन करें जो कि (समिधानम्) = ज्ञान से समिद्ध व दीप्त हैं, (सुप्रयसम्) = उत्तम अन्नोंवाले हैं। वस्तुतः उत्तम अन्नों के द्वारा हमें सात्त्विक बुद्धि प्राप्त कराके हमारे ज्ञान को प्रभु उज्ज्वल करते हैं । (स्वर्णरम्) = इस प्रकार वे प्रभु हमें स्वर्ग की ओर ले जानेवाले हैं। द्युक्षम् - वे प्रभु दीप्त हैंप्रकाशमयलोक में निवास करनेवाले हैं। हम भी अपने हृदयों को निर्मल बनाते हैं तो उन हृदयों में प्रभु का निवास होता है । (होतारम्) = वे प्रभु हमें सब आवश्यक पदार्थों के देनेवाले हैं। वृजनेषुबलों में (धूर्षदम्) = मुख्य पद पर विराजनेवाले हैं-अपने उपासकों को भी शक्तिसम्पन्न बनानेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ –'यज्ञ, त्यागपूर्वक अदन, शक्तियों का विस्तार तथा ज्ञान की वाणियों का अध्ययन' यही प्रभुपूजन है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनरग्निविषयतो विद्वद्गुणानाह।

अन्वय:

हे विद्वांसो जना यूयं तना गिरा वृजनेषु धूर्षदं होतारं समिधानं सुप्रयसं द्युक्षं स्वर्णरं जातवेदसमग्निं हविषा यजध्वमनेन यज्ञेन वर्द्धत ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञेन) सङ्गतिकरणेन (वर्द्धत) (जातवेदसम्) जातवित्तम् (अग्निम्) (यजध्वम्) सङ्गच्छध्वम् (हविषा) दानेन (तना) विस्तृतया (गिरा) वाण्या (समिधानम्) सम्यक् प्रदीप्तम् (सुप्रयसम्) सुष्ठु कमनीयम् (स्वर्णरम्) सुखस्य नेतारम् (द्युक्षम्) प्रकाशमानम् (होतारम्) आदातारम् (वृजनेषु) ब्रजन्ति जना येषु मार्गेषु (धूर्षदम्) यानानां धुरं गमयितारम् ॥१॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्या शिल्पक्रियया विद्युदादिस्वरूपं यानादिषु कार्येषु संप्रयुञ्जीरंस्त ऐश्वर्यं लभेरन् ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - By yajna, research and development, expand the power and gifts of Agni, treasure of knowledge and power. Ignited and shining, rich and beautiful, harbinger of wealth and comfort, brilliant, generous giver of gifts, energy and power, it moves the wheels of action on the paths of progress. Develop it with holy inputs offered with elaborate voices of vast and far-reaching meaning.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Significance of technologists underlined.

अन्वय:

O Agni ( technologist and scholar) ! with your speech and actions helping in the flights of aircrafts, you come at the altar of the Yajna (non-violent sacrificial act). You accept the offerings are brilliant and handsome and giver of happiness. It imparts wealth and knowledge and is obtainable through donations and Yajnas. Let us all grow with spirit of sacrifices.

भावार्थभाषाः - Such people become prosperous who apply their faculties for generating energy and manufacturing aircrafts.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात अग्नीविषयक विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.

भावार्थभाषाः - जी माणसे शिल्पविद्येद्वारे विद्युत इत्यादीला यानांमध्ये चांगल्याप्रकारे युक्त करतात त्यांना ऐश्वर्य लाभते. ॥ १ ॥