अपा॑य्य॒स्यान्ध॑सो॒ मदा॑य॒ मनी॑षिणः सुवा॒नस्य॒ प्रय॑सः। यस्मि॒न्निन्द्रः॑ प्र॒दिवि॑ वावृधा॒न ओको॑ द॒धे ब्र॑ह्म॒ण्यन्त॑श्च॒ नरः॑॥
apāyy asyāndhaso madāya manīṣiṇaḥ suvānasya prayasaḥ | yasminn indraḥ pradivi vāvṛdhāna oko dadhe brahmaṇyantaś ca naraḥ ||
अपा॑यि। अ॒स्य। अन्ध॑सः। मदा॑य। मनी॑षिणः। सु॒वा॒नस्य॑। प्रय॑सः। यस्मि॑न्। इन्द्रः॑। प्र॒ऽदिवि॑। व॒वृ॒धा॒नः। ओकः॑। द॒धे। ब्र॒ह्म॒ण्यन्तः॑। च॒। नरः॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब नव चावाले उन्नीसवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों के विषय का वर्णन करते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्द्र व ब्रह्मण्यन् का ओकस्
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्वद्विषयमाह।
हे मनीषिणो ब्रह्मण्यन्तो नराश्च यस्मिन् प्रदिवि वावृधान इन्द्र ओको दधे तत्र सुवानस्य प्रयसोऽस्याऽन्धसो मदाय युष्माभिरपायि तद्वयमपि गृह्णीयाम ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The subject of learned persons is dealt.
Desirous of profuse wealth, but having check on the mind, you our pilot leaders ! the full sun holds the world in glaring light and produces fine qualities of Food grains, that gives all beings much delight. That is taken to heart by the learned people, and we should also emulate it.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विद्वान, सूर्य, दाता व दक्षिणा यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागील सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
