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यः सु॑न्व॒ते पच॑ते दु॒ध्र आ चि॒द्वाजं॒ दर्द॑र्षि॒ स किला॑सि स॒त्यः। व॒यं त॑ इन्द्र वि॒श्वह॑ प्रि॒यासः॑ सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaḥ sunvate pacate dudhra ā cid vājaṁ dardarṣi sa kilāsi satyaḥ | vayaṁ ta indra viśvaha priyāsaḥ suvīrāso vidatham ā vadema ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः। सु॒न्व॒ते। पच॑ते। दु॒ध्रः। आ। चि॒त्। वाज॑म्। दर्द॑र्षि। सः। किल॑। अ॒सि॒। स॒त्यः। व॒यम्। ते॒। इ॒न्द्र॒। वि॒श्वह॑। प्रि॒यासः॑। सु॒ऽवीरा॑सः। वि॒दथ॑म्। आ। व॒दे॒म॒॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:12» मन्त्र:15 | अष्टक:2» अध्याय:6» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:2» अनुवाक:2» मन्त्र:15


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्र) परमैश्वर्य के देनेवाले ईश्वर ! (यः) जो (दुध्रः) दुःख से ग्रहण करने योग्य आप (सुन्वते) उत्तम-उत्तम पदार्थों का रस निकालते वा (पचते) पदार्थों को परिपक्व करते हुए के लिये (वाजम्) सबके वेग को (आ,दर्दर्षि) सब ओर से निरन्तर विदीर्ण करते हो (सः) (किल) वही आप (सत्यः) सत्य अर्थात् तीन काल में अबाध्य निरन्तर एकता रखनेवाले हैं उन (ते) आपके (विदथम्) विज्ञानस्वरूप की (प्रियासः) प्रीति और कामना करते हुए (सुवीरासः) सुन्दर वीरोंवाले होते हुए हम लोग (विश्वह) सब दिनों में (चित्) निश्चय से (आ,वदेम) उपदेश करें ॥१५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जो परमेश्वर मूर्ख अधर्मियों से जाना नहीं जा सकता और वह सब जगत् का याथातथ्य रचनेवाला वा विनाश करनेवाला विज्ञानस्वरूप अविनाशी है, उसी की प्रशंसा और उपासना करो ॥१५॥ इस सूक्त में सूर्य, ईश्वर और बिजुली के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बारहवाँ सूक्त और नवमाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'शक्तिप्रदाता' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यः) = जो (दुधः) = दुर्धर्ष व अजेय प्रभु (सुन्वते) = अपने शरीर में सोम का अभिषव करनेवाले के लिए तथा (पचते) = ज्ञानाग्नि में अपना परिपाक करनेवाले के लिए (चित्) = निश्चय से वाजम्शक्ति को (आदर्दर्षि) = ख़ूब ही प्राप्त कराते हैं। (सः) = वे आप (किल) = निश्चय से (सत्यः) = सत्यस्वरूप हैं। २. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन्- सर्वशक्तिमान् प्रभो ! (वयम्) = हम ते आपके (विश्वह) = सदा (प्रियास:) = प्रिय हों और (सुवीरासः) = उत्तम वीर बनते हुए (विदथम्) = ज्ञान का (आवदेम) = सर्वत्र प्रचार करें। ज्ञान की वाणियों को ही परस्पर बोलनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ–‘सुन्वन्' व 'पचन्' बनकर हम प्रभु से शक्ति को प्राप्त करें। वीर बनकर प्रभु के प्रिय हों। सदा ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करें। सम्पूर्ण सूक्त प्रभु का भिन्न-भिन्न रूपों में स्तवन करता है। 'इन्द्र' का स्वरूप अत्यन्त सुन्दरता से प्रतिपादित हुआ है। अगले सूक्त के ऋषि देवता भी क्रमशः गृत्समद व इन्द्र ही हैं -
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

हे इन्द्र यो दुध्रस्त्वं सुन्वते पचते वाजमादर्दषि स किल त्वं सत्योऽसि तस्य ते विदथं प्रियासः सुवीरासस्सन्तो वयं विश्वह चिदावदेम ॥१५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) (सुन्वते) अभिषवं कुर्वते (पचते) परिपक्वं संपादयते (दुध्रः) दुःखेन धर्त्तुं योग्यः। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वेति वर्णलोपो घञर्थे कविधानमिति धृधातोः कः प्रत्ययः। (आ) समन्तात् (चित्) अपि (वाजम्) सर्वेषां वेगम् (दर्दर्षि) भृशं विदृणासि (सः) (किल) (असि) (सत्यः) त्रैकाल्याऽबाध्यः (वयम्) ते तव (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रद (विश्वह) विश्वेषु अहस्सु। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वेत्यलोपः सुपां सुलुगिति विभक्तेर्लुक्। (प्रियासः) प्रीता कामयमानाः (सुवीरासः) शोभना वीरा येषान्ते (विदथम्) विज्ञानस्वरूपम् (आ) (वदेम) उपदिशेम ॥१५॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या यः परमेश्वरो मूर्खैरधर्मात्मभिर्ज्ञातुमशक्यः सर्वस्य जगतः सन्धाता विच्छेदको विज्ञानस्वरूपोऽविनाश्यस्ति तमेव प्रशंसतोपाध्वं च ॥१५॥ अत्र सूर्येश्वरविद्युद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति द्वादशं सूक्तं नवमो वर्गश्व समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of light and life, potent and inviolable, you provide all power and protection with speed of advancement for the creative and struggling perfectionist, and you ward off all force of opposition from him. Lord of existence, surely you are the ultimate Truth, you are eternal. Lord giver of life and potency, we love you, we are your dear darlings. We pray that confident and brave, blest with noble progeny, we may always honour you with holy songs of celebration and creative action in yajna.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The greatness of the Master is elaborated.

अन्वय:

O Master! you give us great strength in prosperity and give us endurance to overcome griefs and distresses by taking the right juices of the herbs. We smash the evils with strength provided by you. You are the eternal unifier and nourishing your love towards us and maintaining wonderful brave persons, we propagate your message all the time.

भावार्थभाषाः - The Lord can not be realized by unrighteous and unwise persons. Those who realize His power of creation and destruction and know well His rational and eternal nature, they would always admire or worship Him.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! ज्या परमेश्वराला मूर्ख अधर्मी लोक जाणू शकत नाहीत, तो सर्व जगाचा यथायोग्य निर्माता व विनाश करणारा, विज्ञानस्वरूप, अविनाशी आहे. त्याचीच प्रशंसा व उपासना करा. ॥ १५ ॥