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यो जा॒त ए॒व प्र॑थ॒मो मन॑स्वान्दे॒वो दे॒वान्क्रतु॑ना प॒र्यभू॑षत्। यस्य॒ शुष्मा॒द्रोद॑सी॒ अभ्य॑सेतां नृ॒म्णस्य॑ म॒ह्ना स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo jāta eva prathamo manasvān devo devān kratunā paryabhūṣat | yasya śuṣmād rodasī abhyasetāṁ nṛmṇasya mahnā sa janāsa indraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः। जा॒तः। ए॒व। प्र॒थ॒मः। मन॑स्वान्। दे॒वः। दे॒वान्। क्रतु॑ना। प॒रि॒ऽअभू॑षत्। यस्य॑। शुष्मा॑त्। रोद॑सी॒ इति॑। अभ्य॑सेताम्। नृ॒म्णस्य॑। म॒ह्ना। सः। ज॒ना॒सः॒। इन्द्रः॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:12» मन्त्र:1 | अष्टक:2» अध्याय:6» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:2» अनुवाक:2» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब पन्द्रह चावाले बारहवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में सूर्य के गुणों का वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (जनासः) विद्वान् जनो ! (यः) जो (प्रथमः) प्रथम वा विस्तारयुक्त (मनस्वान्) जिसमें विज्ञान वर्त्तमान (जातः) उत्पन्न हुआ (देवः) प्रकाशमान (क्रतुना) अपने प्रकाश कर्म से (देवान्) प्रकाशित करने योग्य दिव्यगुणवाले पृथिवी आदि लोकों को (पर्यभूषत्) सब ओर से विभूषित करता है। जिसके बल से (नृम्णस्य) धन के (मह्ना) महत्त्व से (रोदसी) आकाश और पृथिवी (अभ्यसेताम्) अलग होते हैं (सः) वह (इन्द्रः) अपने प्रताप से सब पदार्थों को छिन्न-भिन्न करनेवाला सूर्य है, ऐसा जानना चाहिये ॥१॥
भावार्थभाषाः - जिस ईश्वर ने सबका प्रकाश करने और सबका धारण करनेवाला अपने प्रकाश से युक्त आकर्षण शक्तियुक्त लोकों की व्यवस्था करनेवाला सूर्यलोक बनाया है, वह ईश्वर सूर्य का भी सूर्य है, यह जानना चाहिये ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जातः प्रथमः मनस्वान्

पदार्थान्वयभाषाः - १. (यः) = जो प्रभु (जातः एव) = सदा से प्रादुर्भूत हैं- 'प्रभु कभी जन्म लेंगे' ऐसा प्रश्न ही नहीं पैदा होता। वे सदा से हैं। (प्रथमः) = [प्रथ विस्तारे] अतिशय विस्तारवाले हैं। (मनस्वान्) = ज्ञानवान् हैं—सर्वत्र हैं । (देवः) = प्रकाशमय वे प्रभु (देवान्) = सब देवों को (क्रतुना) = शक्ति से (पर्यभूषत्) = अलंकृत करते हैं। सूर्य-चन्द्र को वे प्रभा प्राप्त कराते हैं-अग्नि को तेज देते हैं तो जल को रसयुक्त करते हैं । वस्तुतः प्रभु ही इन्हें देवत्व प्राप्त कराते हैं 'तेन देवा देवतामग्र आयन्' । २. हे (जनासः) = लोगो! (यस्य शुष्मात्) = जिसके बल से (रोदसी) = द्यावापृथिवी (अभ्यसेताम्) = भयभीत हो उठते हैं - वस्तुतः जिसके भय से ही ये सारे ब्रह्माण्डस्थ लोक अपने-अपने मार्ग पर गति कर रहे हैं (सः) = वह (नृम्णस्य) = बल की (महा) = महिमा से (इन्द्रः) = सब शत्रुओं का विनाश करनेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही सब देवों को शक्ति प्रदान करते हैं, इस प्रभु के शासन में ही सब लोक गति कर रहे हैं। ये प्रभु सदा से प्रादुर्भूत सर्वव्यापक व सर्वत्र हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ सूर्यगुणानाह।

अन्वय:

हे जनासो यः प्रथमो मनस्वान् जातो देवः क्रतुना देवान् पर्य्यभूषद्यस्य शुष्मान्नृम्णस्य मह्ना रोदसी अभ्यसेतां स इन्द्रः सूर्यलोकोऽस्तीति विद्यम् ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) (जातः) उत्पन्नः (एव) (प्रथमः) आदिमो विस्तीर्णो वा (मनस्वान्) मनो विज्ञानं विद्यते यस्य सः (देवः) द्योतमानः (देवान्) प्रकाशितव्यान् दिव्यगुणान् पृथिव्यादीन् (क्रतुना) प्रकाशकर्मणा (पर्य्यभूषत्) सर्वतो भूषत्यलङ्करोति (यस्य) (शुष्मात्) बलात् (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (अभ्यसेताम्) प्रक्षिप्ते भवतः (नृम्णस्य) धनस्य (मह्ना) महत्त्वेन (सः) (जनासः) विद्वांसः (इन्द्रः) दारयिता सूर्य्यः ॥१॥
भावार्थभाषाः - येनेश्वरेण सर्वप्रकाशकः सर्वस्य धर्त्ता स्वप्रकाशाकर्षणाद्व्यवस्थापकः सूर्यलोको निर्मितः स सूर्य्यस्य सूर्योऽस्तीति वेद्यम् ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ye men and women of the world, Indra is the generous self-refulgent lord omnipotent and omniscient who, first manifested, creates and adorns the generous earth and brilliant stars. It is by the grandeur of his mighty wealth and power of action that the heaven and earth and the middle regions of the skies move around in orbit.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The attributes of the sun are stated.

अन्वय:

O scholars ! this sun was born first and later on, it expanded and therefrom the present science came into being. With its actions, it is shining itself and illuminates various divine planets like earth, too. From all sides, its shines like an ornament and with its wealth and glory, sky and earth operate separately. Such a mighty is the sun-called Indra.

भावार्थभाषाः - God created the sun which holds different planets with its gravitation and magnetic power. God is far greater than that sun and is its Lord or Master.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात सूर्य, ईश्वर व विद्युतच्या गुणांचे वर्णन केल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.

भावार्थभाषाः - ज्या ईश्वराने सर्व प्रकाशक, सर्वांचा धारणकर्ता, स्वप्रकाशयुक्त आकर्षण शक्तीने गोलांचा (लोकांचा) व्यवस्थापक असा सूर्यलोक निर्माण केलेला आहे, तो ईश्वर सूर्याचाही सूर्य आहे, हे जाणले पाहिजे. ॥ १ ॥