श्रु॒धी हव॑मिन्द्र॒ मा रि॑षण्यः॒ स्याम॑ ते दा॒वने॒ वसू॑नाम्। इ॒मा हि त्वामूर्जो॑ व॒र्धय॑न्ति वसू॒यवः॒ सिन्ध॑वो॒ न क्षर॑न्तः॥
śrudhī havam indra mā riṣaṇyaḥ syāma te dāvane vasūnām | imā hi tvām ūrjo vardhayanti vasūyavaḥ sindhavo na kṣarantaḥ ||
श्रु॒धि। हव॑म्। इ॒न्द्र॒। मा। रि॒ष॒ण्यः॒। स्याम॑। ते॒। दा॒वने॑। वसू॑नाम्। इ॒माः। हि। त्वाम्। ऊर्जः॑। व॒र्धय॑न्ति। व॒सु॒ऽयवः॑। सिन्ध॑वः। न। क्षर॑न्तः॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब इक्कीस ॠचावाले ग्यारहवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजधर्म का वर्णन करते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
स्वास्थ्य व दान
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ राजधर्ममाह।
हे इन्द्र यं त्वां वसूनां हीमा ऊर्जो वसूयवश्च क्षरन्तः सिन्धवो न वर्द्धयन्ति यस्य ते दावने वयं स्याम स त्वमस्मान् मा रिषण्यो हवञ्च श्रुधि ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The principles of politics or administration are stated.
O king or ruler ! you are possessive of learning glory. Those who are front-rank soldiers or scholars and are desirous of wealth, they make endeavors and shake off others like ocean. Such people grow like ocean for giving away wealth to others. May you do not kill us and listen to our prayers.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात राजधर्म, विद्वान व सेनापतीच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.
