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जो॒हूत्रो॑ अ॒ग्निः प्र॑थ॒मः पि॒तेवे॒ळस्प॒दे मनु॑षा॒ यत्समि॑द्धः। श्रियं॒ वसा॑नो अ॒मृतो॒ विचे॑ता मर्मृ॒जेन्यः॑ श्रव॒स्यः१॒॑ स वा॒जी॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

johūtro agniḥ prathamaḥ piteveḻas pade manuṣā yat samiddhaḥ | śriyaṁ vasāno amṛto vicetā marmṛjenyaḥ śravasyaḥ sa vājī ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

जो॒हूत्रः॑। अ॒ग्निः। प्र॒थ॒मः। पि॒ताऽइ॑व। इ॒ळः। प॒दे। मनु॑षा। यत्। सम्ऽइ॑द्धः। श्रिय॑म्। वसा॑नः। अ॒मृतः॑। विऽचे॑ताः। म॒र्मृ॒जेन्यः॑। श्र॒व॒स्यः॑। सः। वा॒जी॥

ऋग्वेद » मण्डल:2» सूक्त:10» मन्त्र:1 | अष्टक:2» अध्याय:6» वर्ग:2» मन्त्र:1 | मण्डल:2» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब छः चावाले दशवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि विषय का उपदेश किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! (यत्) जो (मनुषा) मनुष्य से (पितेव) पिता के समान (प्रथमः) पहिला विस्तृत गुण कर्मवाला (इळस्पदे) पृथिवी तल पर (जोहूत्रः) अतीव सङ्ग करने अर्थात् कलाघरों में लगाने योग्य (समिद्धः) प्रज्वलित (श्रियम्) शोभा को (वसानः) ढाँपनेवाला (अमृतः) नाशरहित (विचेताः) जिससे चैतन्यपन विगत है अर्थात् जो जड़ (मर्मृजेन्यः) निरन्तर शुद्धि करनेवाला (श्रवस्यः) अन्नादि पदार्थों में उत्तम और (वाजी) बहुत वेगादि गुणों से युक्त (अग्निः) अग्नि शिल्पकार्यों में अच्छे प्रकार प्रयुक्त किया जाता है, (सः) वह तुमको भी संयुक्त करना चाहिये ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अग्नि पृथिवी में प्रसिद्ध, शिल्पकार्य्यों के प्रयोग में अच्छे प्रकार लगाया हुआ धन का देनेवाला, स्वरूप से नित्य, चेतन गुणरहित और अति वेगवान् है, वह अच्छे प्रकार प्रयोग किया हुआ पिता के तुल्य शिल्पीजनों को पालता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उपास्य प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - १. (जोहूत्र:) = [ह्वयतेर्जुहोतेर्वा] सबसे पुकारने योग्य अथवा सब कुछ देनेवाले वे प्रभु हैं, (अग्निः) = वे अग्रणी हैं (प्रथमः) = सर्वव्यापक हैं [प्रथ विस्तारे] । (पिता इव) = पिता के समान हैं अथवा ‘स पूर्वेषामपि गुरुः' की तरह वे प्रभु प्रथम पिता हैं-पिताओं के भी पिता हैं । २. ये प्रभु (यत्) = जब (इडस्पदे) = वाणी के स्थान में (मनुषा) = विचारशील पुरुष से (समिद्धः) = दीप्त होते हैं तो (श्रियं वसानः) = श्री को आच्छादित करनेवाले होते हैं। जो ज्ञान वाणियों को ग्रहण करता हुआ प्रभु का स्तवन करता है, प्रभु उसे श्री से आच्छादित कर देते हैं - उसका जीवन श्रीसम्पन्न बनता है। ३. ये प्रभु (अमृतः) = अमृत हैं-उपासक को अमृतत्व प्राप्त कराते हैं । (विचेता:) = प्रभु विशिष्ट ज्ञानवाले हैं । (मर्मृजेन्यः) = उपासक के जीवन को अत्यन्त शुद्ध बनानेवाले हैं। (अवस्यः) = उत्तम यशवाले (सः) = वे प्रभु वाजीशक्तिशाली हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की उपासना से हमारा जीवन 'श्री से आच्छादित पवित्र, यशस्वी व शक्तिशाली' बनता है ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निविषय उपदिश्यते।

अन्वय:

हे मनुष्या शिल्पिभिर्यद्यो मनुषा पितेव प्रथम इळस्पदे जोहूत्रः समिद्धः श्रियं वसानोऽमृतो विचेता मर्मृजेन्यः श्रवस्यो वाज्यग्निः कार्येषु संप्रयुज्यते स युष्माभिरपि संप्रयोक्तव्यः ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (जोहूत्रः) अतिशयेन सङ्गमनीयः (प्रथम) आदिमो विस्तीर्णगुणकर्मा (पितेव) पितृवत् (इळः) पृथिव्याः। अत्र क्विप् याडभावश्च। (पदे) तले स्थाने (मनुषा) मनुष्येण (यत्) यः (समिद्धः) प्रदीप्तः (श्रियम्) शोभाम् (वसानः) आच्छादकः (अमृतः) नाशरहितः (विचेताः) विगतं चेतो विज्ञानं यस्मात्स जडः (मर्मृजेन्यः) भृशं शोधकः (श्रवस्यः) अन्नेषु साधुः (सः) (वाजी) बहुवेगादिगुणयुक्तः ॥१॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः। योऽग्निः पृथिव्या प्रसिद्धः संप्रयुक्तः सन् धनप्रदः स्वरूपेण नित्यश्चेतनगुणरहितोऽतिवेगवानस्ति स सम्यक् प्रयुक्तः सन् पितृवत्संप्रयोजकान् पालयति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, heat and light of existence, first and primary power of yajnic applications, kindled and raised on earth in the vedi, both spiritual and material, is a source of comfort and protection as a paternal power. Wearing the spectral beauty of colour, indestructible, pure and purifying, it is a splendid power that can be used as fuel food for the production of energy, motion and speed like a horse.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The qualities of scholars are mentioned.

अन्वय:

O scholars ! you deal with the persons as a father, are foremost among the virtuous people and are close to the artists on the earth. You pervade their brilliance highly, which is eternal, purifier, best among the givers of food grains etc. and is fast. This sort of knowledge should be applied in various technologies with your association.

भावार्थभाषाः - The energy is a vital force on the earth and applying it properly and extensively proves a good assistance to the craftsmen, as a father looks after his son.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात अग्नी व विद्वानाच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणली पाहिजे.

भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जो अग्नी पृथ्वीवर विख्यात, शिल्पक्रियेत प्रयुक्त, धन देणारा, स्वरूपाने नित्य, चेतनगुणरहित व अति वेगवान आहे, त्याचा चांगल्या प्रकारे प्रयोग केल्यावर पित्याप्रमाणे शिल्पीजनांचे पालन करतो. ॥ १ ॥