पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वे प्रभु, (न) = जिस प्रकार (अभ्रिय:) = मेघसमूह (यवसे) = भूमि में घास आदि की उत्पत्ति के लिए (उदन्यन्) = जल को देने की कामनावाला होता है उसी प्रकार, (नः क्षयाय) = हमारे उत्तम निवास व गति के लिए (अस्मे) = हमारे लिये (गातुं विदत्) = मार्ग को (विदत्) = प्राप्त कराते हैं । इस मार्ग पर चलकर हम अपने निवास को उत्तम बना पाते हैं । [२] (यत्) = जिस समय एक उपासक (शरीरै:) = अपने 'स्थूल, सूक्ष्म व कारण' नामक सब शरीरों से (इन्दुम्) = उस शक्तिशाली प्रभु का (उपसीदत्) = उपासन करता है, अर्थात् इन सब शरीरों की क्रियाओं को प्रभु स्मरणपूर्वक करता है तो वह (श्येनः) = शंसनीय गतिवाला होता है तथा (अयः अपाष्टि:) = लोहे की एडीवाला होता हुआ, अर्थात् दृढ़ शरीरवाला होता हुआ (दस्यून्) = इन दस्युओं को (हन्ति) = नष्ट कर देता है। दास्यव वृत्तियों को अपने से दूर भगा देता है। लोहे की एड़ीवाला इन शब्दों का प्रयोग ऐसा संकेत करता है कि वह इन दस्युओं को ठोकर मारकर दूर कर देता है [ kicks than away ]।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें मार्गदर्शन कराते हैं, जिस पर कि चलकर हम उत्तम निवासवाले बन पाएँ । प्रभु की उपासना से हमें वह शक्ति प्राप्त होती है जिससे कि हम दास्यव वृत्तियों को नष्ट करनेवाले होते हैं ।
अन्य संदर्भ: सूचना - प्रभु - स्मरणपूर्वक कार्य करना, इन कार्यों को प्रभु की शक्ति से होता हुआ ही प्रभु की उपासना है ।