पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वे प्रभु (द्रुह्वणे) = [द्रुह जिघांसायाम्] हमें मारने की कामना करनेवाले काम-क्रोधादि को [वन्= win] पराजित करनेवाले (मनुषे) = विचारशील पुरुष के लिए (ऊर्ध्वसानः) = उत्कृष्ट प्रदेश को प्राप्त करानेवाले हैं। (अर्शसानाय =) इन काम-क्रोधादि शत्रुओं की हिंसा करनेवाले के लिए वे प्रभु ही (शरुम्) = शत्रुओं के शीर्ण करनेवाले वज्र को (आसाविषत्) = सर्वथा उत्पन्न करते हैं। इस विचारशील पुरुष को वे वह वज्र प्राप्त कराते हैं, जिससे कि वह इन सब शत्रुओं का संहार कर पाता है । [२] (सः) = वे प्रभु ही (नृतमः) = हमारे सर्वोत्तम नेता हैं, (नहुषः) = हम सबको एक दूसरे के साथ बाँधनेवाले हैं। हम सबके पिता होते हुए वे हमें परस्पर (भ्रातृ) = बन्धन में बाँधते हैं । [३] (अस्मान् सुजातः) = हमारे हृदयों में उत्तमता से प्रादुर्भूत हुए हुए वे प्रभु, (अर्हन्) = हमारे से पूज्य होते हुए (दस्युहत्ये) = काम-क्रोधादि दास्यव वृत्तियों के साथ चलनेवाले संग्राम में (पुरः अभिनत्) = इन शत्रु - पुरियों का विध्वंस करते हैं। काम ने इन्द्रियों में, क्रोध ने मन में तथा लोभ ने बुद्धि में जो अपना किला बनाया है, प्रभु उन सबको विध्वस्त कर देते हैं । इन तीनों पुरियों के विध्वंस को करनेवाले वे प्रभु 'त्रिपुरारि' हैं। इनको विध्वस्त करके वे प्रभु हमारे उन्नति मार्ग को निर्विघ्न कर देते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें वह वज्र प्राप्त कराते हैं जिससे कि हम काम-क्रोधादि शत्रुओं का पराजय कर सकें। वे असुर- पुरियों का विध्वंस करके हमें उन्नतिपथ पर आगे ले चलते हैं।