पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (असुर) = हमारी वासनाओं को सुदूर फेंकनेवाले [असु क्षेपणे] प्रभो ! एवा इस प्रकार (महः) = [महतः स्वर्गादे: ] उत्कृष्ट स्वर्गादि लोकों की (वक्षथाय) = प्राप्ति के लिए [ वह प्रापणे] (वम्रकः) = अपनी वासनाओं का उद्गिरण करनेवाला यह उपासक (पड्भिः) = ' वैश्वानरः प्रथमः पादः, तैजसः द्वितीयः पादः, प्राज्ञ स्तृतीयः पादः ' इन शब्दों में वर्णित 'वैश्वानर, तैजस व प्राज्ञ' रूप कदमों के द्वारा (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के समीप (उपसर्पत्) = समीपता से प्राप्त होता है। हम वासनाओं को नष्ट करके सबके हित साधन की वृत्तिवाले बनते हैं, तेजस्वी होते हैं और ज्ञान का वर्धन करके प्रभु प्राप्ति के अधिकारी बनते हैं । [२] (सः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु इस वम्रक से 'वैश्वानर, तैजस व प्राज्ञ' रूप पादों से (इयान:) = जाये जाते हुए (अस्मै) = इस वम्रक के लिए (स्वस्तिम्) = कल्याण को करति करते हैं । (इषं ऊर्जम्) = इसके लिए अन्न व रस को प्राप्त कराते हैं । इस अन्न - रस के द्वारा (सुक्षितिम्) = इसे उत्तम निवास प्राप्त कराते हैं और (विश्वम्) = सब आवश्यक चीजों को (आभाः) = [ आ अभा:- अहाः] प्राप्त कराते हैं [आहरतु] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम वासनाओं को विनष्ट करनेवाले वम्रक बनें। प्रभु हमें अन्न, रस व उत्तम निवास देंगे, सब आवश्यक चीजें प्राप्त कराएँगे । सूक्त का मूल भाव वासनाओं को विनष्ट करनेवाला 'वम्रक' बनना ही है। यह वम्रक 'दुवस्यु' होता है, प्रभु का भक्त [dwotee] बनता है। प्रभु के अभिवादन व स्तवन में आनन्द लेने से यह 'वान्दन: ' कहलाता है । यही अगले सूक्त का ऋषि है। यह प्रार्थना करता है कि- अथ नवमोऽनुवाकः