पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अयम्) = यह उपासक (स्तोमेभिः) = स्तुतियों के द्वारा (औशिजः) = प्रभु प्राप्ति की प्रबल कामनावाला अथवा मेधावी [नि० ३ । १५] होता है । स्तुति से अशुभ वृत्तियाँ नष्ट होती हैं। ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं के दूर होने पर ज्ञान दीप्त हो उठता है । (ऋजिश्वा) = यह व्यक्ति ऋजुमार्ग से आगे बढ़नेवाला [श्वि गतिवृद्धयोः] होता है। उस बृषभेण शक्तिशाली प्रभु के द्वारा यह (पिप्रो:) = पिप्रु के (व्रजम्) = व्रज व बाड़े को (दरयत्) = विदीर्ण करता है 'पिप्रु' वह आसुरवृत्ति है जिसके कारण यह अपने ही खजाने को भरने का ध्यान करता है, टेढ़े-मेढ़े सभी साधनों से धन को ही जुटाने में लगा रहता है [प्रा पूरणे] । यही लोभ है । यह लोभ बुद्धि में अपना अधिष्ठान [व्रज] बनाकर बुद्धि पर परदा डाल देता है। प्रभु की उपासना से यह 'पिप्रु का व्रज' विदीर्ण होता है और बुद्धि चमक उठती है । [२] यह व्यक्ति (सुत्वा) = यज्ञशील होता है, हाथों से सदा यज्ञादि उत्तम कर्म करता रहता है। और (यद्) = जब यह (यजतः) = उस प्रभु का पूजन करनेवाला बनता है तो अपनी बुद्धि में (गीः) = ज्ञान की वाणियों को (दीदयत्) = दीप्त करता है। 'हाथों में यज्ञ, हृदय में प्रभु पूजा तथा बुद्धि में ज्ञान की वाणियाँ' इस पुरुष को दीप्त जीवनवाला बना देती हैं। यह (पुरः) = शत्रु - पुरियों के (प्रति इयानः) = जाता हुआ उनपर आक्रमण करता हुआ, (वर्पसा) = अपने तेजस्वी रूप से (अभिभूत्) = उनका अभिभव करनेवाला होता है शत्रु-पुरियों का विध्वंस करके अपने जीवन को यह दीप्त व सुखी बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु-स्तवन से हम आसुर भावनाओं को दूर करके मेधावी, सरल गति, यज्ञशील, उपासक व ज्ञानी बनें।