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कं न॑श्चि॒त्रमि॑षण्यसि चिकि॒त्वान्पृ॑थु॒ग्मानं॑ वा॒श्रं वा॑वृ॒धध्यै॑ । कत्तस्य॒ दातु॒ शव॑सो॒ व्यु॑ष्टौ॒ तक्ष॒द्वज्रं॑ वृत्र॒तुर॒मपि॑न्वत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kaṁ naś citram iṣaṇyasi cikitvān pṛthugmānaṁ vāśraṁ vāvṛdhadhyai | kat tasya dātu śavaso vyuṣṭau takṣad vajraṁ vṛtraturam apinvat ||

पद पाठ

कम् । नः॒ । चि॒त्रम् । इ॒ष॒ण्य॒सि॒ । चि॒कि॒त्वान् । पृ॒थु॒ऽग्मान॑म् । वा॒श्रम् । व॒वृ॒धध्यै॑ । कत् । तस्य॑ । दातु॑ । शव॑सः । विऽउ॑ष्टौ । तक्ष॑त् । वज्र॑म् । वृ॒त्र॒ऽतुर॑म् । अपि॑न्वत् ॥ १०.९९.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:99» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:14» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में परमात्मा कर्मफल देनेवाला, ज्ञानप्रकाशदाता, स्तुतिकर्ता को मोक्ष में लेनेवाला, दुष्ट को दण्ड देता है। उसकी उपासना से उपासक अपनी इन्द्रियों को वश करता है, इत्यादि विषय वर्णित हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (नः) हमारे लिए (चित्रं कम्) श्रवण करने योग्य-कमनीय सुखद (पृथुग्मानं वाश्रम्) विस्तृत परिणामवाले वक्तव्य या प्रशंसनीय वेदज्ञान को हमारी वृद्धि-उन्नति के लिए (चिकित्वान्) बोध देता हुआ जनाता हुआ (इषण्यसि) परमात्मन् ! तू प्रेरित करता है (तस्य शवसः) उस तुझ बलवान् का कैसा अद्भुत दान है (व्युष्टौ) विविध-कामना निमित्त (तक्षत्) सम्पन्न करता है, या प्रकट करता है (वृत्रतुरं वज्रम्) आवरक अज्ञान के नाशक वज्रसमान या ओजरूप ज्ञानामृत को (अपिन्वत्) सींचता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अद्भुत श्रवण करने योग्य सुखद वेदज्ञान का उपदेश करता है, हमें बोध देकर उन्नतिपथ पर ले जाता है, यह ज्ञानदान अज्ञान का नाश करता है, अमृतरूपी इस ज्ञान को हमारे अन्दर सींचता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अद्भुत आनन्दप्रद ज्ञान की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (चिकित्वान्) = ज्ञानी होते हुए आप (नः) = हमारे लिए (कम्) = आनन्द को देनेवाले (चित्रम्) = चेतानेवाले ज्ञान को (इषण्यसि) = आप प्रेरित करते हैं। जो ज्ञान (पृथुग्मानम्) = [पृथुभावं प्राप्नुवन्तं] पृथुभाव को विस्तार को प्राप्त करनेवाला है, जिस ज्ञान को प्राप्त करके हम संकुचित व अनुदार नहीं रहते, जो ज्ञान हमें विशाल बनानेवाला है। (वाश्रम्) = जो स्तुति के योग्य व प्रशंसनीय है । (वावृधध्यै) = जो ज्ञान वर्धन के लिये होता है, जिस ज्ञान को प्राप्त करके हम उन्नत ही उन्नत होते चलते हैं । [२] (तस्य) = उस प्रभु का (दातु) = दान (कम्) = आनन्दप्रद है । (शवसः व्युष्टौ) = बल के उदय होने [व्युष्टि = dawn उषा] के निमित्त अथवा [व्युष्टि - prospesity] बल के ऐश्वर्य के निमित्त वे प्रभु (वज्रं तक्षत्) = क्रियाशीलता रूप वज्र को बनाते हैं और इस वज्र के द्वारा (वृत्रतुरम्) = वासनारूप शत्रु को हिंसित करनेवाले को (अपिन्वत्) = प्रीणित करते हैं अथवा आनन्द से सींचते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें ज्ञान देते हैं । शक्ति के ऐश्वर्य को प्राप्त कराने के लिए क्रियाशीलता रूप वज्र को प्राप्त कराते हैं। इस वज्र से वासना का संहार होने पर ही तो शक्ति मिलती है ।
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ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते परमात्मा कर्मफलविधाता ज्ञानप्रकाशस्य दाता स्तोतारं मोक्षे स्वीकर्ता, दुष्टाय दण्डं प्रयच्छति, तदुपासनेनोपासकः स्वेन्द्रियाणि वशीकरोतीत्येवमादयो विषयाः वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (नः) अस्मभ्यं (चित्रं कम्) चायनीयं निशाम्यं श्रोतव्यम् “चायृ पूजानिशामनयोः” [भ्वादि०] तथा कमनीयं सुखकरं (पृथुग्मानं वाश्रम्) विस्तृतपरिणामवन्तं वक्तव्यं प्रशंसनीयं वा वेदज्ञानम् (ववृध्यै) अस्माकं वर्धनाय-उन्नतये (चिकित्वान्) बोधयन् सन् (इषण्यसि) त्वं परमात्मन् !  प्रेरयसि (तस्य शवसः) तस्य बलवतः परमात्मनः (कत्-दातु) कथम्भूतमद्भुतं दानमस्ति (व्युष्टौ) विविधकामनानिमित्तं (तक्षत्) तक्षति-करोति “तक्षति करोतिकर्मा” [निरु० ४।१९] प्रकटीकरोति स परमात्मा (वृत्रतुरं वज्रम्) आवरकस्याज्ञानस्य नाशकमोजः “वज्रो वा ओजः” ज्ञानामृतम् (अपिन्वत्) अस्मासु सिञ्चति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Knowing us all, Indra wishes us well, gives us comfort and well being, gifts wondrous and varied, expansive and admirable, for our progress and advancement. Great is his gift of bliss, the mighty one, for our fulfilment. And what could be our gift in return for his kindness? He creates and wields the thunder for breaking the cloud and strikes the thunderbolt to destroy the evil, and he gives us the showers that we may grow and rise in life.