वांछित मन्त्र चुनें

उच्छुष्मा॒ ओष॑धीनां॒ गावो॑ गो॒ष्ठादि॑वेरते । धनं॑ सनि॒ष्यन्ती॑नामा॒त्मानं॒ तव॑ पूरुष ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uc chuṣmā oṣadhīnāṁ gāvo goṣṭhād iverate | dhanaṁ saniṣyantīnām ātmānaṁ tava pūruṣa ||

पद पाठ

उत् । शुष्माः॑ । ओष॑धीनाम् । गावः॑ । गो॒ष्ठात्ऽइ॑व । ई॒र॒ते॒ । धन॑म् । स॒नि॒ष्यन्ती॑नाम् । आ॒त्मान॑म् । तव॑ । पु॒रु॒ष॒ ॥ १०.९७.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:97» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:8


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सनिष्यन्तीनाम्) सम्भजनीय सेवन करने योग्य (ओषधीनाम्) ओषधियों के (शुष्माः) बलवान्-बलप्रदरस (गोष्ठात्-इव) गोस्थान से जैसे (गावः) गौवें (उत् ईरते) उछलती हुई निकलती हैं, वैसे (पुरुष) हे रोगी जन ! (तव) तेरे (आत्मानम्) आत्मा के प्रति (धनम्) तृप्त करनेवाला रस उछलता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - समस्त सेवन करने योग्य ओषधियों के प्रत्यग्र बलवान् रस रोगी को देने चाहिएँ, उससे रोगी के शिथिल रक्त आदि धातु बढ़कर उसके आत्मा मन शरीर को तृप्त व तेजस्वी बना देते हैं ॥८॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अध्यात्म सम्पत्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इव) = जिस प्रकार (गावः) = गौवें (गोष्ठात्) = गोष्ठ से उदीरते बाहर आती हैं, इसी प्रकार (ओषधीनाम्) = ओषधियों के (शुष्माः) = शत्रुशोषक बल (उदीरते) = उद्गत होते हैं । इन ओषधि वनस्पतियों में वह शक्ति है जो हमारे शत्रुभूत रोगकृमियों को समाप्त कर देती है । [२] हे (पुरुष) = प्रभो ! हमारे में उन ओषधियों के शुष्म उद्गत हों जो (तव) = आपके (आत्मानं धनम्) = अपने धन को (सनिष्यन्तीनाम्) = देनेवाली हैं । अर्थात् जो आत्मतत्त्वरूप धन को प्राप्त कराती हैं। पाँचवें मन्त्र में कहा था कि इनके सेवन से चित्तवृत्ति प्रभु-प्रवण होती है, चित्तवृत्ति को प्रभु प्रवण करके ये आत्मतत्त्व रूप धन को प्राप्त करानेवाली होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ओषधियाँ रोगकृमिनाशक बल से तो युक्त हैं ही। ये चित्तवृत्ति को प्रभु-प्रवण करके आत्मिक धन का भी लाभ कराती हैं।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सनिष्यन्तीनाम्-ओषधीनाम्) सनिष्यमाणानां सम्भज्यमानानां सेव्यमानानामोषधीनां (शुष्माः) बलवन्तो रसाः (गोष्ठात्-इव गावः-उत् ईरते) यथा गोस्थानात्-खलु गाव उद्गच्छन्ति तद्वदुत्प्लुत्य गच्छन्ति (पुरुष) हे रोगग्रस्त ! (तव-आत्मानम्-धनम्) तवात्मानं प्रति प्रीणनकरं रसमुत्स्रावयन्ति ॥८॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And the strength and vitality of herbs which, O man, they bestow on you as the wealth of health for your body, mind and soul, stream forth to you like cows emerging from their stall or light rays radiating at dawn.