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याश्चे॒दमु॑पशृ॒ण्वन्ति॒ याश्च॑ दू॒रं परा॑गताः । सर्वा॑: सं॒गत्य॑ वीरुधो॒ऽस्यै सं द॑त्त वी॒र्य॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yāś cedam upaśṛṇvanti yāś ca dūram parāgatāḥ | sarvāḥ saṁgatya vīrudho syai saṁ datta vīryam ||

पद पाठ

याः । च॒ । इ॒दम् । उ॒प॒ऽशृ॒ण्वन्ति॑ । याः । च॒ । दू॒रम् । परा॑ऽगताः । सर्वाः॑ । स॒म्ऽगत्य॑ । वी॒रु॒धः॒ । अ॒स्यै । सम् । द॒त्त॒ । वी॒र्य॑म् ॥ १०.९७.२१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:97» मन्त्र:21 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:11» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:21


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (याः च) और जिन ओषधियों को (इदम्-उपशृण्वन्ति) पढ़नेवाले गुरुमुख से इस प्रकार सुनते हैं कि ऐसे गुणवाली ओषधि हैं (च) और (याः) जो ओषधियाँ (दूरं परागताः) दूर देश से प्राप्त होती हैं (सर्वाः-वीरुधः) वे सारी ओषधियाँ (सङ्गत्य) मिलकर (अस्यै) इस रुग्ण देह के लिये (वीर्यम्) अपने बल या सार को (संदत्त) सम्यक् देओ ॥२१॥
भावार्थभाषाः - ओषधियों के गुणधर्म परम्परा से सुने जाते हैं कि इस ओषधि में ये गुण हैं, वह समीप में हो या दूर देश में, उन्हें लाकर सबको यथोचित मिलाकर रोगी को देने से रोगनाशक बल प्राप्त होता है, अतः कई ओषधियों को मिलाकर भी देना चाहिये ॥२१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

समीपस्थ व दूरस्थ ओषधियाँ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (याः च) = जो ओषधियाँ (इदम्) = हमारे इस ओषधि स्तवन को (उपशृण्वन्ति) = समीपता से सुनती हैं, अर्थात् जो समीप प्रदेश में ही उपलभ्य हैं, (याः च) = और जो (दूरं परागताः) = दूर प्रदेशों में प्राप्य हैं। (सर्वा:) = वे सब (वीरुधः) = ओषधियाँ (संगत्य) = एक दूसरे से मिलकर, एक दूसरे के अवाञ्छनीय प्रभाव को दूर करके अधिक गुणकारी होती हुई (अस्यै) = इस रुग्ण शरीर के लिए (वीर्यम्) = शक्ति को (संदत्त) = दें। [२] ओषधियाँ परस्पर मिलकर अधिक गुणकारी हो जाती हैं। एक की तीव्रता को दूसरी कुछ मन्द करनेवाली हो जाती है, और इस प्रकार रुग्ण शरीर के लिए सह्य बन जाती है। ये ओषधियाँ शक्ति को उत्पन्न करके मनुष्य को नीरोग बनाती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - समीप में व दूर स्थान में प्राप्त होनेवाली सब ओषधियाँ हमारे लिए मिलकर शक्ति का संपादन करनेवाली हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (याः-च-इदम्-उपशृण्वन्ति) याः-ओषधीः-अध्येतारो गुरुमुखात् खलु शृण्वन्ति यदिदं गुणमस्या इति, (याः-च दूरं परागताः) या ओषधयो दूरदेशात् प्राप्ता भवन्ति (सर्वाः-वीरुधः सङ्गत्य) सर्वा ओषधीः सम्यग्मिलित्वा (अस्यै वीर्यं-संदत्त) अस्यै रुग्णतन्वै सारं सम्यक् दत्त ॥२१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Those herbs which hear this word close by, and those which grow far away, may all these herbs join together and give life’s vitality to this patient.