शपथ्य, वरुण्य, यम व पड्वीश
पदार्थान्वयभाषाः - [१] ये ओषधियाँ (मा) = मुझे (शपथ्यात्) = [शप आक्रोशे] आक्रोश के जनक रोगों से, उन पैत्तिक विकारों से जिनसे कि पीड़ित हुआ हुआ मनुष्य उटपटांग बोलता है, (मुञ्चन्तु) = मुक्त करें। इन ओषधियों के समुचित प्रयोग से मेरा पैत्तिक विकार शान्त हो । [२] (अथ उ) = और अब (वरुण्यात् उत) = वरुण्य रोग से भी ये मुझे मुक्त करें । वरुण जलाधिष्ठातृदेव है । एवं वरुण्य रोग कफजनित रोग हैं। वस्तुतः जलों के अनिष्ट प्रयोग से ही प्रायः इनकी उत्पत्ति होती है । [३] (अथ उ) = अब निश्चय से (यमस्य पड्वीशात्) = [अयं वै यमः योऽयंपवते] इस सबका नियन्त्रण करनेवाली वायु के पादबन्धन से भी ये ओषधियाँ मुझे मुक्त करें । वात विकार होने पर पाँव आदि जकड़े से जाते हैं। गठिया आदि रोगों में मनुष्य के पैरों में बेड़ी-सी पड़ जाती है। इस पादबन्धन से ये ओषधियाँ मुझे मुक्त करें। [४] (सर्वस्मात्) = सब (देवकिल्विषात्) = आँख, कान, नाक, मुख आदि देवों में होनेवाले दोषों से ये ओषधियाँ हमें छुड़ायें। ये सब इन्द्रियाँ देव हैं, नेत्र 'सूर्य' है, श्रोत्र 'दिशाएँ' हैं, वाणी 'अग्नि' है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस प्रकार इन सब देवों में उत्पन्न हो जानेवाली न्यूनताओं को ये औषध दूर करें ।