पदार्थान्वयभाषाः - [१] शरीर में रोग 'वात, पित्त व कफ' के विकार के कारण होते हैं। वातिक विकार से उत्पन्न रोगों का निर्देश प्रस्तुत मन्त्र में 'वातस्य ध्राज्या' इन शब्दों से हो रहा है । लेष्यजन्य रोगों का संकेत 'किकिदीविना' शब्द से हुआ है। श्लेष्मावरुद्ध कण्ठजन्य ध्वनि का अनुकरण 'किकि' शब्द है, उस ध्वनि के साथ दीप्त होनेवाला यह श्लेष्यजन्य रोग है । 'चण भक्षणे' से बना हुआ 'चाण' शब्द भस्मक आदि पैत्रिक रोगों का वाचक है। इन रोगों में अति पीड़ा के होने पर मनुष्य 'हा मरा' इस प्रकार चीख पड़ता है। उस पीड़ा का वाचक 'निहाका' शब्द है। [२] हे (यक्ष्म) = रोग ! तू (चाषेण) = पित्त विकार से होनेवाले राक्षसी भूखवाले भस्मकादि रोगों के (साकम्) = साथ (प्रपत) = इस शरीर से दूर हो जा । (किकिदीविना) = कफजन्य रोग के साथ तू यहाँ से नष्ट हो जा । (वातस्य ध्राज्या) = वात की गति व व्याप्ति जनित रोगों के (साकम्) = साथ तू इस शरीर से दूर हो। तथा (निहाकया) = प्रबल पीड़ा के (साकम्) = साथ नश्य तू इस शरीर से अदृष्ट हो जा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - औषध प्रयोग से पित्त, कफ व वात जनित सब विकार दूर हों। रोगजनित प्रबल पीड़ा भी दूर हो।