पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्य) = जिसके (हरिणी) = [ऋक्सामे वा इन्द्रस्य हरी श० १।१] ऋक् और साम- विज्ञान व भक्ति (स्रुवा इव) = दो स्रुवों के समान, यज्ञपात्रों के समान (विपेततुः) = विशिष्ट गतिवाले होते हैं, अर्थात् जिसके जीवन में विज्ञान व भक्ति का समन्वय होता है । [२] (यस्य) = जिसके (शिप्रे) = हनू और नासिका (वाजाय) = शक्ति वृद्धि के लिए होते हुए (हरिणी) = रोगों व वासनाओं का हरण करनेवाले होकर (दविध्वतः) - रोगों व वासनाओं को कम्पित करते हैं। 'हनू' भोजन का ठीक चर्वण करते हुए, ठीक पाचन के द्वारा, शक्ति वृद्धि का कारण होते हैं। इस प्रकार इनके ठीक कार्य करने से सामान्यतः रोग नहीं आते। नासिका के ठीक कार्य करने पर प्राणायाम के द्वारा वासनाओं का विनाश होता है । इससे चित्तवृत्ति का निरोध होकर मन आधिशून्य बना रहता है। [३] इस वासनाशून्य मन के होने पर (हर्यतस्य) = अत्यन्त कान्त, कमनीय, (मदस्य) = आनन्द के कारणभूत (अन्धसः) = सोम का (पीत्वा) = पान करके, सोम को शरीर में ही व्याप्त करके इस (कृते चमसे) संस्कृत शरीर में [शरीर को 'तिर्यग् बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः' कहा है] (यद्) = जो (हरी) ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्व हैं उनको (मर्मृजत्) = शुद्ध कर डालता है । सोम के शरीर में रक्षण से इन्द्रियों की भक्ति दीप्त हो उठती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दो यज्ञपात्रों की तरह हमारे जीवनयज्ञ में विज्ञान व भक्ति का मेल हो। हमारे इन्द्रियाँ हमारी नीरोगता के साधन हों। हमारी नासिका निर्वासनता का साधक बनें [प्राणायाम द्वारा ] सोमपान द्वारा, इस संस्कृत शरीर में हमारी इन्द्रियाँ दीप्तशक्तिवाली हों ।