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सो अ॑स्य॒ वज्रो॒ हरि॑तो॒ य आ॑य॒सो हरि॒र्निका॑मो॒ हरि॒रा गभ॑स्त्योः । द्यु॒म्नी सु॑शि॒प्रो हरि॑मन्युसायक॒ इन्द्रे॒ नि रू॒पा हरि॑ता मिमिक्षिरे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

so asya vajro harito ya āyaso harir nikāmo harir ā gabhastyoḥ | dyumnī suśipro harimanyusāyaka indre ni rūpā haritā mimikṣire ||

पद पाठ

सः । अ॒स्य॒ । वज्रः॑ । हरि॑तः । यः । आ॒य॒सः । हरिः॑ । निऽका॑मः । हरिः॑ । आ । गभ॑स्त्योः । द्यु॒म्नी । सु॒ऽशि॒प्रः । हरि॑मन्युऽसायकः । इन्द्रे॑ । नि । रू॒पा । हरि॑ता । मि॒मि॒क्षि॒रे॒ ॥ १०.९६.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:96» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस परमात्मा का (सः-वज्रः) यह शस्त्रविशेष है, (यः) जो (हरितः) दुःखहारक (आयसः) तेजस्वी है (गभस्त्योः) भुजाओं-हाथों में (हरिः) दुःख अज्ञान का हरनेवाला है (द्युम्नी) यशस्वी-यशस्कर (सुशिप्रः) सुष्ठु सुख प्राप्त करानेवाला (हरिमन्युसायकः) दुःख अज्ञान शत्रुओं का नाशक मन्युरूप सायक अर्थात् वाण जिसका है, ऐसा (इन्द्रे) परमात्मा में (हरिता) मनोहर (रूपा) गुणरूप (नि मिमिक्षिरे) स्वतः निषिक्त है ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का वज्र तेजस्वी दुःख, अज्ञान शत्रुओं को नष्ट करनेवाला है। उसमें परमात्मा का मन्युरूप वाण लगा हुआ है, परमात्मा में मनोहर गुण धर्म स्वतः ही रखे हैं, उसकी उपासना करनी चाहिए ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हरिमन्युसायक

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह (अस्य) = इस जितेन्द्रिय पुरुष का (यः) = जो (वज्रः) = क्रियाशीलतारूप वज्र है, वह (हरितः) = सूर्य-किरणों के समान इसे उज्ज्वल बनानेवाला है [हरित् = a horse of the sun ], (आयसः) = लोहे के समान दृढ़ शरीरवाला करता है । [२] इस क्रियामय जीवन में (हरिः) = सब दुःखों का हरण करनेवाला प्रभु ही (निकामः) = इसके लिए नितरां चाहने योग्य होता है। ये कर्त्तव्य बुद्धि से कर्मों को करता है, सब सांसारिक फलों की कामना से ऊपर उठा हुआ 'अ-क्रतु' बनता है, एक मात्र प्रभु प्राप्ति के संकल्पवाला होता है। परिणामतः इसके लिए वे (हरिः) = दुःखों का हरण करनेवाला प्रभु (आगभस्त्योः) = हाथों में ही होते हैं, हस्तामलकवत् हो जाते हैं, प्रत्यक्ष होते हैं । [२] यह व्यक्ति (द्युम्नी) = ज्योतिर्मय जीवनवाला बनता है, (सुशिप्र:) = [ शिप्रो हनू नासिके वा नि०] उत्तम जबड़ों व नासिकावाला होता है। खूब चबाकर खाता है तथा प्राणायाम को नियम से करता है। परिणामतः पूर्ण स्वस्थ जीवनवाला बनता है । [३] (हरिमन्यु) = हरि का, प्रभु का, (मन्यु) = ज्ञान ही इसका शत्रुओं का अन्त करनेवाला (सायक) = बाण बनता है । इस (इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (हरितारूपा) = सब तेजस्वीरूप (निमिमिक्षिरे) = निश्चय से सिक्त होते हैं । यह सूर्य किरणों के समान चमकता है। इसके सब अंग-प्रत्यंग दीप्त व ज्योतिर्मय बने रहते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - क्रियाशील पुरुष तेजस्वी दृढ़ शरीर व अन्ततः प्रभु को प्राप्त करनेवाला होता है । प्रभु का ज्ञान ही इसका शत्रु संहारक बाण बनता है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः-अस्य वज्रः-हरितः-यः-आयसः) अस्य परमात्मनः स वज्रः शस्त्रविशेषः सौवर्णः-दीप्यमानो दुःखहरणशीलः (गभस्त्योः-हरिः) भुजयोः-हस्तयोर्वा “गभस्ती बाहुनाम” [निघ० २।४] “पाणी वै गभस्ती” [श० ४।१।१।९] दुःखाज्ञानहारकः (द्युम्नी) यशस्वी-यशोदाता (सुशिप्रः) सुष्ठु सुखप्रापकः “सुशिप्र सुष्ठु सुखप्रापकः” [ऋ० १।१७।१० दयानन्दः-“अत्र शेवृ धातोः पृषोदरादिनेष्टसिद्धिः” दयानन्दः] (हरिमन्युसायकः) दुःखाज्ञानशत्रूणां नाशको मन्युदेवसायको वाणो यस्य तथाभूतः (इन्द्रे) ऐश्वर्यवति परमात्मनि (हरिता रूपा नि मिमिक्षिरे) मनोहराणि गुणस्वरूपाणि स्वतो निषिक्तानि सन्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That power of Hari, omnipotent Indra, is the thunderbolt, and the thunderbolt is electric, magnetic, unfailing in aim and desire and it is borne in the hands of centrifugal and centripetal forces. It is bright and blazing, mighty passionate, punitive and destructive for the evil. Indeed in Indra as in the sun, all forms, all colours and all beauties are integrated.