पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह (अस्य) = इस जितेन्द्रिय पुरुष का (यः) = जो (वज्रः) = क्रियाशीलतारूप वज्र है, वह (हरितः) = सूर्य-किरणों के समान इसे उज्ज्वल बनानेवाला है [हरित् = a horse of the sun ], (आयसः) = लोहे के समान दृढ़ शरीरवाला करता है । [२] इस क्रियामय जीवन में (हरिः) = सब दुःखों का हरण करनेवाला प्रभु ही (निकामः) = इसके लिए नितरां चाहने योग्य होता है। ये कर्त्तव्य बुद्धि से कर्मों को करता है, सब सांसारिक फलों की कामना से ऊपर उठा हुआ 'अ-क्रतु' बनता है, एक मात्र प्रभु प्राप्ति के संकल्पवाला होता है। परिणामतः इसके लिए वे (हरिः) = दुःखों का हरण करनेवाला प्रभु (आगभस्त्योः) = हाथों में ही होते हैं, हस्तामलकवत् हो जाते हैं, प्रत्यक्ष होते हैं । [२] यह व्यक्ति (द्युम्नी) = ज्योतिर्मय जीवनवाला बनता है, (सुशिप्र:) = [ शिप्रो हनू नासिके वा नि०] उत्तम जबड़ों व नासिकावाला होता है। खूब चबाकर खाता है तथा प्राणायाम को नियम से करता है। परिणामतः पूर्ण स्वस्थ जीवनवाला बनता है । [३] (हरिमन्यु) = हरि का, प्रभु का, (मन्यु) = ज्ञान ही इसका शत्रुओं का अन्त करनेवाला (सायक) = बाण बनता है । इस (इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (हरितारूपा) = सब तेजस्वीरूप (निमिमिक्षिरे) = निश्चय से सिक्त होते हैं । यह सूर्य किरणों के समान चमकता है। इसके सब अंग-प्रत्यंग दीप्त व ज्योतिर्मय बने रहते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - क्रियाशील पुरुष तेजस्वी दृढ़ शरीर व अन्ततः प्रभु को प्राप्त करनेवाला होता है । प्रभु का ज्ञान ही इसका शत्रु संहारक बाण बनता है ।