पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (हरिशिप्रम्) = हरणशील हैं हनू व नासिका जिसकी जबड़े तो भोजन का खूब चर्वण करके रोगों को दूर करनेवाले हैं तथा नासिका प्राणायाम के द्वारा वासनाओं को विनष्ट करनेवाली है । इस प्रकार ये हनू व नासिका दोनों ही 'हरि' हैं । (त्वा) = इस तुझ हरिशिप्र को, (हर्यन्तम्) = प्रभु प्राप्ति की कामनावाले को (जनानाम्) = लोगों की (प्रयुजः) = प्रकृष्ट योगवृत्तियाँ (रथे) = इस शरीर रथ पर (आवहन्तु) = धारण करनेवाली हों। इन प्रयुजों से ही तू प्रभु को प्राप्त करनेवाला बनेगा। [२] इन योगवृत्तियों को तू अवश्य धारण कर, (यथा) = जिससे तू (प्रतिभृतस्य) = प्रतिदिन तेरे में पोषित होनेवाले (मध्वः) = सोम का, सब भोजनों के सारभूत मधुतुल्य सोम का (पिबा) = पान करनेवाला हो । [३] तू (सधमादे) = प्रभु प्राप्ति के द्वारा प्रभु के साथ [सह] मिलकर आनन्द अनुभव करने के निमित्त (दशोणिम्) = [ओणि = protection] दसों इन्द्रियों की रक्षा करनेवाले अथवा [ओणि=removing] दसों इन्द्रियों को विषयों से अपनीत करनेवाले (यज्ञम्) = श्रेष्ठतम कर्म की (हर्यन्) = कामना करनेवाला हो, श्रेष्ठतम कर्म की ओर तू चलनेवाला हो। [हर्य गतिकान्त्योः] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मनुष्य योगवृत्तिवाला बने, सोम का धारण करे, प्रभु प्राप्ति के आनन्द के लिए दसों इन्द्रियों के रक्षक यज्ञ को करनेवाला हो, अर्थात् सदा उत्तम कर्मों में लगा ।