'पति का प्रेम' व 'पत्नी का उत्साह'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] उर्वशी कहती है कि (यदा) = जब (मर्तः) = मनुष्य (अमृतासु) = वैषयिक वस्तुओं के पीछे न मरकर केवल पति के प्रेम को चाहनेवाली (आसु) = इन पत्नियों में (निस्पृक्) = नि:शेषेण [adhese ] सम्पर्कवाला होता है, जब वह (क्षोणीभिः) = [क्षु शके] = [ वाग्भिः सा० ] वाणियों से, (न) = इसी प्रकार (क्रतुभिः) = कर्मों से या संकल्पों से (संपृक्ते) = पत्नी के साथ ही सम्पर्कवाला होता है, अर्थात् 'मनसा वाचा कर्मणा' वह पत्नी का ही हो जाता है, और जब उसका प्रेम किसी अन्य स्त्री के लिए नहीं होता, तब (ताः) = वे पत्नियाँ (आतयः न) = आति नामक सुन्दर पंखोंवाले पक्षी के समान (स्वाः तन्वः सुम्भत) = अपने शरीरों को शोभित करती हैं। वे प्रसन्न मनोवृत्तिवाली होती हैं और वह प्रसन्नता उनकी वेशभूषा में प्रकट होती है। 'आतयः ' शब्द में क्रियाशीलता की भी भावना है। उनका जीवन खूब उत्साहपूर्वक कर्मों में लगा हुआ होता है। पति का प्रेम उनके जीवन में स्फूर्ति का संचार करता है। [२] ये (दन्दशाना:) = जिह्वा से ओष्ठप्रान्तों को काटते से हुए (अश्वासः न) = शक्तिशाली घोड़ों के समान (क्रीडय:) = सारे कार्यों को क्रीड़क की मनोवृत्ति से करनेवाली होती हैं। शक्तिशाली घोड़ा आलस्यमय स्थिति में खड़ा नहीं रह सकता। ये गृहिणियाँ भी उस प्रेम के वातावरण में शक्ति व स्फूर्ति का अनुभव करती हैं और पूर्ण उत्साह से गृहकार्यों में व्यापृत रहती हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति का पूर्ण प्रेम प्राप्त करने पर पत्नी का हृदय उत्साह से पूर्ण होता है और स्फूर्ति-सम्पन्न होकर ये गृह कार्यों में व्यापृत होती हैं ।