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मे॒धा॒का॒रं वि॒दथ॑स्य प्र॒साध॑नम॒ग्निं होता॑रं परि॒भूत॑मं म॒तिम् । तमिदर्भे॑ ह॒विष्या स॑मा॒नमित्तमिन्म॒हे वृ॑णते॒ नान्यं त्वत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

medhākāraṁ vidathasya prasādhanam agniṁ hotāram paribhūtamam matim | tam id arbhe haviṣy ā samānam it tam in mahe vṛṇate nānyaṁ tvat ||

पद पाठ

मे॒धा॒ऽका॒रम् । वि॒दथ॑स्य । प्र॒ऽसाध॑नम् । अ॒ग्निम् । होता॑रम् । प॒रि॒ऽभूत॑मम् । म॒तिम् । तम् । इत् । अर्भे॑ । ह॒विषि॑ । आ । स॒मा॒नम् । इत् । तम् । इत् । म॒हे । वृ॒ण॒ते॒ । न । अ॒न्यम् । त्वत् ॥ १०.९१.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:91» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:21» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:8


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) उस (मेधाकारम्) मेधा के आविष्कारकर्त्ता-मेधाप्रद (विदथस्य प्रसाधनम्) अनुभवनीय अध्यात्मयज्ञ के प्रसाधक (होतारम्) तथा स्वीकार करनेवाले (परिभूतमम्) सर्वाधिष्ठाता (मतिम्) मेधावी (अग्निम्) परमात्मा को (इत्) ही (अर्भे हविषि) अल्प ग्रहण करने योग्य लौकिक भोग सुख के निमित्त (महे) महान् ग्रहण करने योग्य मोक्ष आनन्द के लिए (तम्-इत्-समानम्-इत्) उस परमात्मा को यथावत् सादर ही (आ वृणते) मनुष्य भली-भाँति वरते हैं-प्रार्थित करते हैं (त्वत्-अन्यं-न) हे परमात्मन् ! तुझसे भिन्न को नहीं वरते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा बुद्धि देनेवाला है और अध्यात्मयज्ञ का साधनेवाला-सफल करनेवाला है, सर्वधिष्ठाता है, सांसारिक भोग सुख तथा महान् मोक्ष सुख देनेवाला है, उससे आदर के साथ उपासक जन अपने कल्याणार्थ प्रार्थना करते हैं, अन्य से नहीं ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

बुद्धि व ज्ञान के दाता प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तं इत्) = उस प्रभु को ही (वृणते) = उपासक वरते हैं। जो प्रभु (मेधाकारम्) = हमारे में मेधा का सम्पादन करनेवाले हैं, (विदथस्य) = ज्ञान को (प्रसाधनम्) = सिद्ध करनेवाले हैं। इस प्रकार बुद्धि और ज्ञान के द्वारा (अग्निम्) = हमें आगे ले चलनेवाले हैं, (होतारम्) = उन्नति के लिए सब आवश्यक साधनों को देनेवाले हैं। मार्ग में आनेवाले विघ्नों को (परिभूतमम्) = अधिक से अधिक परिभूत करनेवाले हैं। [२] (तं मतिम्) = उस ज्ञानस्वरूप प्रभु को (इत्) = ही (अर्भे) = छोटे (हविषि) = यज्ञ में और उसे ही (महे) = महान् यज्ञ में [वृणते] वरण करते हैं। उस प्रभु से ही इन यज्ञों के साधन के लिए हम प्रार्थना करते हैं। (सं आनम्) = सम्यक् आनित प्रणित करनेवाले प्रभु की ही प्रार्थना करते हैं, त्वत् अन्यं न तेरे से भिन्न की नहीं । आपकी प्रार्थना करते हुए हम इन यज्ञों को आपसे ही होता हुआ जानते हैं, हमें इनके करने का गर्व नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सब यज्ञ उस प्रभु से ही हो रहे हैं, वे ही हमें बुद्धि व ज्ञान देते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) तं खलु (मेधाकारम्) प्रज्ञाया आविष्कर्त्तारं (विदथस्य प्रसाधनम्) वेदनस्य-अनुभवनीयस्य-अध्यात्मयज्ञस्य “विदथानि वेदनानि” [निरु० ६।७] “विदथो यज्ञनाम” [निघ० ३।१७] प्रसाधयितारम् (होतारम्) अध्यात्मयज्ञस्य स्वीकर्त्तारं (परिभूतमम्) सर्वाधिष्ठातारं (मतिम्) मेधाविनम् “मतयः मेधाविनाम” [निघ० ३।१५] (अग्निम्) परमात्मानम् (इत्) एव (अर्भे हविषि) अल्पे “अर्भाय अल्पाय” [ऋ० १।१४६।५ दयानन्दः] ग्रहीतव्ये लौकिकभोगसुखनिमित्ते (महे) महते ग्रहीतव्ये मोक्षानन्दाय (तम्-इत्-समानम्-इत्) तं परमात्मानं यथावत् सादरमेव (आ वृणते) जनाः समन्तात् वृण्वन्ति-स्वीकुर्वन्ति-प्रार्थयन्ते (त्वत्-अन्यं न) परमात्मन् ! त्वद्भिन्नं न ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Devotees choose to worship Agni alone, none other than Agni, giver of intelligence, accomplisher of yajna and education for knowledge, high priest of yajnic existence, supreme over all, omniscient wise, and equally loving for all, whether the havi offered is small or great, whether the purpose is high or low. O lord of light, they choose none other than you.