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अहा॑व्यग्ने ह॒विरा॒स्ये॑ ते स्रु॒ची॑व घृ॒तं च॒म्वी॑व॒ सोम॑: । वा॒ज॒सनिं॑ र॒यिम॒स्मे सु॒वीरं॑ प्रश॒स्तं धे॑हि य॒शसं॑ बृ॒हन्त॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ahāvy agne havir āsye te srucīva ghṛtaṁ camvīva somaḥ | vājasaniṁ rayim asme suvīram praśastaṁ dhehi yaśasam bṛhantam ||

पद पाठ

अहा॑वि । अ॒ग्ने॒ । ह॒विः । आ॒स्ये॑ । ते॒ । स्रु॒चिऽइ॑व । घृ॒तम् । च॒म्वि॑ऽइव । सोमः॑ । वा॒ज॒ऽसनि॑म् । र॒यिम् । अ॒स्मे इति॑ । सु॒ऽवीर॑म् । प्र॒ऽश॒स्तम् । धे॒हि॒ । य॒शस॑म् । बृ॒हन्त॑म् ॥ १०.९१.१५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:91» मन्त्र:15 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:15


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! (ते) तेरी प्राप्ति के लिए (हविः-आस्ये-अहावि) अपने आत्मा को तेरे व्याप्तिरूप मुख में देता हूँ-समर्पित करता हूँ (स्रुचि-इव-घृतम्) जैसे स्रुवा में घृत रखा जाता है (चम्वि-इव सोमः) जैसे चमस-पात्र में सोमरस रखा जाता है (अस्मे) हमारे लिए (वाजसनिम्) अमृतान्नभोग प्राप्त करनेवाले-(सुवीरम्) उत्तम प्राणोंवाले (प्रशस्तम्) श्रेष्ठ (यशसम्) यशस्वी (बृहन्तम्) महान् (रयिं धेहि) आत्मपोष को-शान्ति संतोष को धारण कराए ॥१५॥   
भावार्थभाषाः - परमात्मा के व्याप्त स्वरूप में अपने आत्मा को समर्पित कर देवे, तो वह परमात्मा उत्तम जीवन यशस्वी सुख शान्ति संतोषरूप स्वात्मस्वरूप को हमारे अन्दर रख देता है ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

एषणा-त्रय-प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो! (ते) = आपकी प्राप्ति के लिए (आस्ये) = मुख में (हविः) = हवि (अहावि) = आहुत की जाती है। मैं आपकी पूजा के लिए सदा दानपूर्वक अदन करनेवाला बनता हूँ [हुदाने] 'कस्मै देवा हविषा विधेम' । मुख में हवि को मैं इस प्रकार डालता हूँ (इवः) = जैसे कि (स्स्रुचि) = चम्मच में (घृतम्) = घृत को (इव) = और जैसे (चम्वि) = चमूपात्र में (सोमः) = सोम को। ये दोनों उपमाएँ यज्ञियक्षेत्र की हैं। भोजन को भी मैं यज्ञ का रूप देता हूँ । चम्मच में घृत को लेकर अग्नि में आहुत करते हैं, इसी प्रकार मुख में हविरूप भोजन को लेकर वैश्वानर अग्नि में भेजते हैं। सोम को चमू द्वारा अग्नि में आहुत करते हैं, इसी प्रकार शरीर में भी सोम को [=वीर्य को] धारण करके ज्ञानाग्नि में आहुत करते हैं । [२] हे प्रभो ! इस प्रकार हविरूप भोजन से आपका पूजन करने पर आप (अस्मे) = हमारे लिये निम्न तीन चीजों को (धेहि) = धारण कीजिये - [क] (वाजसनिं रयिम्) = उस धन को जो हमारे लिए अन्नों को प्राप्त करानेवाला है । भोजनाच्छादन के लिए आवश्यक धन की इच्छा ही उचित 'वित्तैषणा' है। इस एषणा को आप पूर्ण कीजिये। [ख] (प्रशस्तं सुवीरम्) = अपने कर्मों व योग्यताओं से प्रशंसनीय उत्तम पुत्र को प्राप्त कराइये। आपकी कृपा से हमारी सन्तान उत्तम व प्रशंसनीय हो। इस प्रकार हमारी (पुत्रैषणा) = को आप पूर्ण करें। [ग] (बृहन्तम्) = सदा वृद्धि को प्राप्त करते हुए (यशसम्) = यश को हमें प्राप्त कराइये। हमारी उचित लोकैषणा भी पूर्ण हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम हवि के द्वारा प्रभु-पूजन करें। प्रभु हमें आवश्यक धन, प्रशस्त सन्तान व बढ़ता हुआ यश प्राप्त कराएँ । यह सम्पूर्ण सूक्त प्रभु के स्तवन व प्रभु प्राप्ति के लिए हवि के स्वीकार को प्रतिपादित कर रहा है । हवि का सेवन करनेवाला, ज्योतिर्मय मस्तिष्कवाला 'अरुण वैतहव्य' इसका ऋषि था। यह 'अरुण' अब 'मानव' विचारशील बन जाता है और 'शार्यात ' = [शृ हिंसायाम्, या प्रापणे] सब वासनाओं का हिंसन करता हुआ प्रभु को प्राप्त करनेवाला होता है। इसका कथन है कि-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक ! (ते) तुभ्यं तव प्राप्तये (हविः-आस्ये-अहावि) स्वात्मानं व्याप्त्याख्ये मुखे-“आस्ये व्याप्त्याख्ये मुखे” [ऋ० ६।१।६३ दयानन्दः] ददामि समर्पयामि (स्रुचि-इव घृतम्) यथा स्रुवायां घृतं स्थापयति (चम्वि-इव-सोमः) यथा चमसे-पात्रे सोमरसः स्थाप्यते (अस्मे) अस्मभ्यम् (वाजसनिम्) अमृतान्नभोगप्राप्तिकरम् “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै० २।१९३] (सुवीरम्) शोभनप्राणवन्तम् “प्राणा वै वीराः” [श० १२।८।१।२२] (प्रशस्तम्) श्रेष्ठं (यशसम्) यशस्विनं (बृहन्तम्) महान्तम् (रयिं धेहि) आत्मपोषं “रयिं देहि पोषं देहि” [काठ० १।७] धारय-स्थापय ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, fragrant havi is offered into the sacred fire as ghrta in the ladle and soma in the cup. Pray bear and bring us rising prosperity with food, sustenance and victory, wealth, noble progeny, and honour and glory of the noblest order.