वांछित मन्त्र चुनें

यस्मि॒न्नश्वा॑स ऋष॒भास॑ उ॒क्षणो॑ व॒शा मे॒षा अ॑वसृ॒ष्टास॒ आहु॑ताः । की॒ला॒ल॒पे सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे॑ हृ॒दा म॒तिं ज॑नये॒ चारु॑म॒ग्नये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasminn aśvāsa ṛṣabhāsa ukṣaṇo vaśā meṣā avasṛṣṭāsa āhutāḥ | kīlālape somapṛṣṭhāya vedhase hṛdā matiṁ janaye cārum agnaye ||

पद पाठ

यस्मि॑न् । अश्वा॑सः । ऋ॒ष॒भासः॑ । उ॒क्षणः॑ । व॒शाः । मे॒षाः । अ॒व॒ऽसृ॒ष्टासः । आऽहु॑ताः । की॒ला॒ल॒ऽपे । सोम॑ऽपृष्ठाय । वे॒धसे॑ । हृ॒दा । म॒तिम् । ज॒न॒ये॒ । चारु॑म् । अ॒ग्नये॑ ॥ १०.९१.१४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:91» मन्त्र:14 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:14


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्मिन्) जिस उपासना में लाये परमात्मा में अथवा जिसके आश्रय में (उक्षणः) सींचने में समर्थ (अश्वासः) घोड़े (ऋषभासः) वृषभ (वशाः) कमनीय दूध देनेवाली गौवें (मेषाः) ऊन देनेवाली भेड़ बकरियाँ (अवसृष्टासः) पर्याप्त (आहुताः) अभिप्राप्त (कीलालपे) उस अन्नरक्षक (सोमपृष्ठाय) सौम्य औषधीरस जैसा आनन्द स्पृष्ट किया है, आत्मा में भावित किया है जिसके आश्रय से, उस (वेधसे-अग्नये) उस विधाता परमात्मा के लिए (हृदा-चारुं मतिं जनये) हृदय से मन से अतिसुन्दर आस्तिक मति को मैं उत्पन्न करता हूँ ॥१४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ने हमें बलवान् घोड़े वृषभ-साँड सुन्दर कमनीय दूध देनेवाली भेड़ बकरियाँ आवश्यकतानुसार प्रदान किये हैं तथा अन्न और रस जीवन के अन्दर समाने के लिये दिए हैं, उस परमात्मा की हृदय से मन से आस्तिक भाव के साथ स्तुति किया करें ॥१४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु प्राप्ति किनको ?

पदार्थान्वयभाषाः - [१] मैं (अग्नये) = उस अग्रेणी प्रभु के लिए (हृदा) = श्रद्धा से (चारुं मतिम्) ज्ञान का खूब ही वरण करनेवाली बुद्धि को (जनये) = उत्पन्न करता हूँ । इस सूक्ष्म बुद्धि से ही तो प्रभु का दर्शन होता है । उस प्रभु की प्राप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक आचार्यों के समीप रहकर स्वाध्याय करते हुए बुद्धि को सूक्ष्म बनाना ही मार्ग है । [२] उस प्रभु की प्राप्ति के लिए मैं मति को उत्पन्न करता हूँ जो (वेधसे) = सृष्टि के विधाता हैं। (कीलालपे) = हमारे शरीर में (कीलाल) = आपः - रेतः कणों का रक्षण करनेवाले हैं। प्रभु स्मरण से वासना विनष्ट होती है और वासना - विनाश से शरीर में इस रेतः शक्ति का रक्षण होता है। इस रेतःशक्ति को 'कीलाल' [कील+अल] इसलिए कहा है कि यह शरीर में [कील बन्धने] बद्ध होकर [अल-वारण] रोगों का वारण करती है । (सोमपृष्ठाय) = वे प्रभु 'सोम पृष्ठ' हैं, सौम्यता के आधार व पोषक हैं। जो व्यक्ति जितना-जितना प्रभु के समीप होता जाता है उतना उतना सौम्य बनता जाता है 'ब्रह्मणा अर्वाङ् विपश्यति' । एवं प्रभु के उपासन से मैं शक्ति का रक्षण करके नीरोग बनूँगा, सौम्य बनूँगा और निर्माणात्मक कार्यों में प्रवृत्त हो पाऊँगा । [३] उस प्रभु की प्राप्ति के लिये मैं बुद्धि को सूक्ष्म बनाता हूँ (यस्मिन्) = जिसमें (अश्वासः) = [अशू व्याप्तौ ] सदा कर्मों में व्याप्त रहनेवाले लोग, (ऋषभासः) = शक्ति का सम्पादन करके आन्तर शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाले [ऋष = to kill] (उक्षण:) = अपने को सुरक्षित वीर्य से सिक्त करनेवाले, (वशा:) = अपने को वश में करनेवाले तथा (मेषा:) = [to rival to contend] स्पर्धापूर्वक आगे बढ़नेवाले लोग (अव- सृष्टासः) = विषय - व्यावृत्त होकर [ अव-away] भेजे हुए [seud forth] होते हैं, अर्थात् ये लोग विषयों में न फँसकर प्रभु की ओर चलनेवाले होते हैं। और अन्ततोगत्वा (आहुताः) = उस प्रभु के प्रति अर्पित होते हैं [हुदाने] । ये अपना प्रभु के प्रति अर्पण करनेवाले बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम 'अश्व, ऋषभ, उक्षा, वश व मेष' बनकर प्रभु के प्रति चलें, उसके प्रति अपना अर्पण करें। वे प्रभु हमारी शक्ति का रक्षण करनेवाले, हमें सौम्यता को प्राप्त करानेवाले व हमारी सब शक्तियों का निर्माण करनेवाले हैं । उस प्रभु की प्राप्ति के लिए हम श्रद्धा से ज्ञानोत्पादिनी बुद्धि को अपने में उत्पन्न करते हैं ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्मिन्) यस्मिन्नुपासिते परमात्मनि यदाश्रये वा (उक्षणः-अश्वासः) सेचनसमर्थाः अश्वाः (ऋषभासः) वृषभाः (वशाः) कमनीया दुग्ध-दात्र्यो गावः (मेषाः) ऊर्णप्रदाः-अजावयः (अवसृष्टासः) पर्याप्ताः (आहुताः) अभिहुताः-अभिगृहीताः प्राप्ता भवन्ति “आहुतं-अभिहुतम्” [निरु० २।२५] तस्मै (कीलालपे) अन्नरक्षकाय “कीलालम् अन्ननाम” [निघ० २।७] (सोमपृष्ठाय) सोमः सौम्यौषधिरस इवानन्दः पृष्ठः स्पृष्टीकृतो यस्मात् स तस्मै (वेधसे-अग्नये) विधात्रे परमात्मने (हृदा चारुं मतिं जनये) हृदयेन मनसा स्तुतिमास्तिकीं मतिं वा जनये-उत्पादयामि ॥१४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - With love and devotion at heart I create this song of thoughtful praise for the kind and gracious Agni under whose order and dispensation horses, virile bulls, cows, sheep and goats are created and range around freely and then are called back to the stalls.