जप से 'ज्ञान शक्ति व प्रभु प्रियता' ही प्राप्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्मत्) = हमारे से (इमाः) = ये (मतयः) = मनन व विचार से युक्त (वाचः) = स्तुति वाणियाँ (अस्मै) = इस प्रभु के लिए (समग्मत) = संगत होती हैं, अर्थात् हम उस प्रभु के नाम का जप करते हैं [वाचः ] और उस नाम के अर्थ का भावन-चिन्तन करते हैं । 'तज्जषः, तदर्थभावनम्'। [२] इस प्रकार उस प्रभु का स्तवन करने पर (ऋचः) = प्रकृति का ज्ञान देनेवाली ऋचाएँ, (गिरः) = जीव के कर्त्तव्यों का उपदेश देनेवाली यजूरूप वाणियाँ तथा (सुष्टुतयः) = उपासनात्मक साम मन्त्र (आ समग्मतः) = सब प्रकार से हमारे साथ संगत होते हैं। हम 'ऋग्, यजु, साम' रूप त्रयी विद्या को प्राप्त करते हैं । [३] (वसूयवः) = वसुओं को अपने साथ मिलाने की कामनावाले हम (वसवे) = [वासयति इति वसुः] सबके वसानेवाले जातवेदसे उस सर्वज्ञ प्रभु के लिए उन स्तुतियों को करते हैं, (यासु वृद्धासु चित्) = जिन स्तुतियों के बढ़े हुए होने पर निश्चय से वे प्रभु (वर्धनः) = हमारा वर्धन करनेवाले हैं और (चाकनत्) = [कामयते] हमारे पर प्रेम करनेवाले होते हैं । वस्तुतः प्रभु तो सदा हमारा हित चाहते ही हैं, हमें उस हित को प्राप्त करने का पात्र बनने की आवश्यकता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु के नाम का अर्थभावनपूर्वक जप करते हैं। इस जप से [क] हमारा ज्ञान बढ़ता है, [ख] हमारी शक्तियों का वर्धन होता है, [ग] हम प्रभु के प्रिय बनते हैं ।