'चन्द्र, सूर्य, इन्द्र-अग्नि, वायु'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मनसः) = मन के दृष्टिकोण से यह प्रभु को धारण करनेवाला (चन्द्रमाः जातः) = चन्द्रमा हो जाता है। 'चदि आह्लादे' से चन्द्र शब्द बनता है। यह प्रभु-भक्त सदा आह्लादमय मनवाला होता है । 'मनः प्रसाद' से सदा यह स्मितवदन दिखता है । [२] (चक्षोः) = चक्षु से सूर्यः अजायत यह सूर्य बन जाता है। सूर्य जैसे अन्धकार को दूर करनेवाला है, इसी प्रकार इसकी चक्षु इसके अज्ञानान्धकार को सदा दूर करनेवाली बनती है। यह आँख सब पदार्थों को सूक्ष्मता से देखती हुई इसके तत्त्वज्ञान का साधन बनती है। [३] (मुखात्) = मुख से यह (इन्द्रः च अग्निः च) = इन्द्र और अग्नि बनता है। मुख के दो कार्य हैं 'खाना और बोलना' पहले कार्य के दृष्टिकोण से यह जितेन्द्रिय बनता है, इन्द्रियों का अधिष्ठाता ही इन्द्र है । जितेन्द्रिय होता हुआ यह स्वाद के लिए न खाकर केवल शरीरधारण के लिए खाता है। दूसरे कार्य के दृष्टिकोण से यह अग्नि बनता है, इसके मुख से निकले हुए शब्द अग्नि होते हैं, आगे ले चलनेवाले होते हैं, सबको उत्साहित करनेवाले होते हैं। [४] (प्राणाद्) = प्राण के दृष्टिकोण से, जीवन के दृष्टिकोण से यह (वायुः अजायत) = वायु हो जाता है। 'वा गतौ' वायु चलती है, इसका जीवन भी बड़ा क्रियाशील होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु को धारण करनेवाले के जीवन में ये बातें होती हैं— [क] मनः प्रसाद, [ख] प्रकाशमय दृष्टि, [ग] जितेन्द्रियता व उत्साहमय वाणी, [घ] क्रियाशीलता ।