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यत्पुरु॑षं॒ व्यद॑धुः कति॒धा व्य॑कल्पयन् । मुखं॒ किम॑स्य॒ कौ बा॒हू का ऊ॒रू पादा॑ उच्येते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat puruṣaṁ vy adadhuḥ katidhā vy akalpayan | mukhaṁ kim asya kau bāhū kā ūrū pādā ucyete ||

पद पाठ

यत् । पुरु॑षम् । वि । अद॑धुः । क॒ति॒धा । वि । अ॒क॒ल्प॒य॒न् । मुख॑म् । किम् । अ॒स्य॒ । कौ । बा॒हू इति॑ । कौ । ऊ॒रू इति॑ । पादौ॑ । उ॒च्ये॒ते॒ इति॑ ॥ १०.९०.११

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:90» मन्त्र:11 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:11


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्-पुरुषं वि अदधुः)  जो परमात्मा को पुरुषरूप में कल्पित किया है, देहरूप में निर्धारित किया है (कतिधा वि अकल्पयन्) कितने प्रकारों से कल्पित किया है (अस्य मुखं किम्-आसीत्) इसका मुख क्या है (कौ बाहू) कौन सी भुजाएँ हैं  (कौ-ऊरू पादा उच्येते) कौन सी जङ्घाएँ हैं, कौन से पैर कहाते हैं ॥११॥
भावार्थभाषाः - रुपकालङ्कार से समष्टि पुरुष को देह में कल्पित किया है। प्रश्न है कि उसका मुख कौन है, भुजाएँ कौन हैं, जङ्घाएँ कौन सी हैं और पैर कौन से हैं। इसका उत्तर अगले मन्त्र में है ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु धारण से क्या लाभ ?

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (पुरुषम्) = संसार नगरी में निवास शयन, करनेवाले प्रभु को 'देव-साध्य व ऋषि' (व्यदधुः) = अपने में विशेषरूप से धारण करते हैं तो वे (कतिधा) = कितने प्रकार से (व्यकल्पयन्) = [विक्लृष्]=अपने को विशिष्ट परामर्शवाला बनाते हैं । प्रभु के धारण करनेवाले में अन्य पुरुषों से क्या विशेष शक्ति उत्पन्न हो जाती है ? [२] (अस्य मुखं किम्) = इसका मुख्य क्या हो जाता है ? क्या यह अन्य पुरुषों की तरह ही बोलचालवाला नहीं होता ? (कौ बाहू) = इसके बाहु क्या हो जाते हैं ? इसके बाहु क्या सामान्य लोगों की तरह कार्य करनेवाले नहीं होते ? (का ऊरू) = इसकी जाँघें क्या हो जाती हैं? अथर्व के अनुसार इसका मध्यभाग- पेट क्या हो जाता है ? (पादा [का] उच्येते) = इसके पाँव क्या कहाते हैं ? इसकी चाल-ढाल और लोगों से किस दिशा में भिन्न होती है ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ - यदि प्रभु के धारण के बाद भी हमारे जीवनों में कोई विशेषता न आये, तो प्रभु धारण की कोई उपयोगिता नहीं प्रतीत होती । इसी कारण यह प्रश्न है कि प्रभु धारण से क्या परिवर्तन होता है ? अगले मन्त्रों में इसी प्रश्न का विस्तृत उत्तर है-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत् पुरुषं वि अदधुः) यत्पुनः परमात्मानं पुरुषं पुरुषरूपं देहरूपं मन्त्रद्रष्टारौ निर्धारितवन्तः (कतिधा-वि अकल्पयन्) कियत्प्रकारेण कल्पितवन्तः (अस्य मुखं किम्-आसीत्) अस्य मुखं किमस्ति (कौ बाहू) कौ भुजौ (कौ ऊरू-पादा उच्येते) के जङ्घे पादौ कावुच्येते ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - How do the Rshis visualise the manifestive modes of the Purusha? What was his mouth? What the arms? What the thighs? What are the feet as they are said to be?