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आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ ऊ॒र्जे द॑धातन । म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āpo hi ṣṭhā mayobhuvas tā na ūrje dadhātana | mahe raṇāya cakṣase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आपः॑ । हि । स्थ । म॒यः॒ऽभुवः॑ । ताः । नः॒ । ऊ॒र्जे । द॒धा॒त॒न॒ । म॒हे । रणा॑य । चक्ष॑से ॥ १०.९.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:9» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:5» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में ‘आपः’ शब्द से जलों के गुण और लाभ बतलाये गये हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (ताः-आपः) वे तुम जलो ! (मयः-भुवः) सुख को भावित कराने वाले-सुखसम्पादक (हि स्थ) अवश्य हो (नः) हमें (ऊर्जे) जीवनबल के लिये (महे रणाय चक्षसे) महान् रमणीय दर्शन के लिए (दधातन) धारण करो ॥१॥
भावार्थभाषाः - जल अवश्य सुखकारण और जीवनबल देनेवाले हैं। यथावसर शीतजल या उष्णजल उपयुक्त हुआ तथा महान् रमणीय दर्शन बाहिरी दृष्टि से नेत्र-शक्ति धारण करानेवाला, भीतरी दृष्टि से मानस शान्ति वा अध्यात्मदर्शन कराने का हेतु भी है। इसी प्रकार आप विद्वान् जन भी सुखसाधक, जीवन में प्रेरणा देनेवाले और अध्यात्मदर्शन के निमित्त हैं। उनका सङ्ग करना चाहिए ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जल व नीरोगता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (आप:) = जल (हि) = निश्चय से (स्था:) = हैं (मयोभुवः) = कल्याण व नीरोगता को उत्पन्न करनेवाले। अर्थात् जलों के समुचित प्रयोग से हम अपने शरीरों को पूर्णतया नीरोग बना पाते हैं । (ता:) = वे जल (नः) = हमें (ऊर्जे) = बल व प्राणशक्ति में (दधातन) = धारण करें। जलों का समुचित प्रयोग यह है कि - [क] हम स्नान के लिये ठण्डे पानी का प्रयोग स्पजिंग के रूप में [ घर्षण स्नान के रूप में] करें और पीने के लिये यथासम्भव गरम का। [ख] प्रातः जीभ व दाँतों को साफ करने के बाद जितना सम्भव हो उतना पानी पीयें, यही हमारी [Bed tea ] हो । [ग] भोजन में थोड़ा-थोड़ा करके बीच-बीच में कई बार पानी लें 'मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि' । [२] इस प्रकार जलों का प्रयोग करने पर ये जल (महे) = हमारे महत्त्व के लिये हों, शरीर के भार को कुछ बढ़ाने के लिये हों। जलों के घर्षण स्नान आदि के रूप में प्रयोग से शरीर का उचित भार बढ़ता है। भारी शरीर कुछ हल्का हो जाता है और हल्का शरीर उचित भार को प्राप्त करता है। [३] (रणाय) = [रणशब्दे] जल का उचित प्रयोग शब्द शक्ति के विकास के लिये होता है। वाणी में शक्ति आ जाने से हम 'पर्जन्य निनदोपमः ' मेघगर्जना के समान गम्भीर ध्वनि वाले बनते हैं । [४] (चक्षसे) = जलों के ठीक प्रयोग से ये दृष्टिशक्ति की वृद्धि के कारण बनते हैं। भोजन के बाद गीले हाथों के तलों से आँखों को कुछ मलना, प्रातः ठण्डे पानी के छींटे देना आदि प्रयोग दृष्टिशक्ति को बढ़ाते हैं, उष:पान तो निश्चय से इसके लिये अत्यन्त उपयोगी है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जल 'नीरोगता, बल व प्राणशक्ति, महत्त्व [भारः] शब्दशक्ति व दृष्टिशक्ति' के वर्धक हैं।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते ‘आपः’ इति शब्देन जलानां गुणलाभाः प्रोच्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (ताः-आपः) ता यूयमापः ! (मयः-भुवः) सुखस्य भावयित्र्यः-सुखसम्पादिका वा “मयः सुखनाम” [निघ० ३।६] (हि स्थ) अवश्यं स्थ (नः) अस्मान् (ऊर्जे) जीवनबलाय (महे रणाय चक्षसे) महते रमणीयाय दर्शनाय (दधातन) धारयत ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Apah, liquid energies of cosmic space, surely you are creators and givers of peace and joy. Pray inspire and energise us for the achievement of food and energy for body, mind and soul so that we may see and enjoy the mighty splendour of divinity.