पदार्थान्वयभाषाः - [१] (आप:) = जल (हि) = निश्चय से (स्था:) = हैं (मयोभुवः) = कल्याण व नीरोगता को उत्पन्न करनेवाले। अर्थात् जलों के समुचित प्रयोग से हम अपने शरीरों को पूर्णतया नीरोग बना पाते हैं । (ता:) = वे जल (नः) = हमें (ऊर्जे) = बल व प्राणशक्ति में (दधातन) = धारण करें। जलों का समुचित प्रयोग यह है कि - [क] हम स्नान के लिये ठण्डे पानी का प्रयोग स्पजिंग के रूप में [ घर्षण स्नान के रूप में] करें और पीने के लिये यथासम्भव गरम का। [ख] प्रातः जीभ व दाँतों को साफ करने के बाद जितना सम्भव हो उतना पानी पीयें, यही हमारी [Bed tea ] हो । [ग] भोजन में थोड़ा-थोड़ा करके बीच-बीच में कई बार पानी लें 'मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि' । [२] इस प्रकार जलों का प्रयोग करने पर ये जल (महे) = हमारे महत्त्व के लिये हों, शरीर के भार को कुछ बढ़ाने के लिये हों। जलों के घर्षण स्नान आदि के रूप में प्रयोग से शरीर का उचित भार बढ़ता है। भारी शरीर कुछ हल्का हो जाता है और हल्का शरीर उचित भार को प्राप्त करता है। [३] (रणाय) = [रणशब्दे] जल का उचित प्रयोग शब्द शक्ति के विकास के लिये होता है। वाणी में शक्ति आ जाने से हम 'पर्जन्य निनदोपमः ' मेघगर्जना के समान गम्भीर ध्वनि वाले बनते हैं । [४] (चक्षसे) = जलों के ठीक प्रयोग से ये दृष्टिशक्ति की वृद्धि के कारण बनते हैं। भोजन के बाद गीले हाथों के तलों से आँखों को कुछ मलना, प्रातः ठण्डे पानी के छींटे देना आदि प्रयोग दृष्टिशक्ति को बढ़ाते हैं, उष:पान तो निश्चय से इसके लिये अत्यन्त उपयोगी है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जल 'नीरोगता, बल व प्राणशक्ति, महत्त्व [भारः] शब्दशक्ति व दृष्टिशक्ति' के वर्धक हैं।