पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (दुरेवा:) = दुष्ट गमनों [= आचरणों] वाले (मित्रम्) = मित्र द्वेषता को (प्रमिनन्ति) = हिंसित करते हैं, अर्थात् मित्रता [ = स्नेह की भावना] का विलोप करते हैं। इसी प्रकार जो (अर्यमणम्) = अर्यमा देव को (प्र) [ मिनन्ति ] = नष्ट करते हैं, [ अरीन् यच्छति] कामादि शत्रुओं के जीतने के भाव को नष्ट करते हैं । (संगिर:) = उत्तम ज्ञानप्रद वाणियों व स्तुति वाणियों का (प्र) [ मिनन्ति ] = नाश करते हैं, अर्थात् जो स्वाध्याय व स्तवन को छोड़ देते हैं, (वरुणम्) = वरुण देवता को (प्र) [ मिनन्ति ] = नष्ट करते हैं, अर्थात् निर्देषता के भाव से दूर होकर द्वेषमय जीवनवाले हो जाते हैं। उन अमित्रेषु -अमित्रों पर, स्नेहरहित जनों पर अपने को पाप व मृत्यु से न बचानेवालों पर, (हे इन्द्र) = सब आसुरवृत्तियों का संहार करनेवाले प्रभो ! (वृषन्) = शक्तिशाली प्रभो ! (वधम्) = उस नाशक अस्त्र को, वज्र को (शिशीहि) = तीक्ष्ण करिये जो (तुम्रम्) = गतिशील है [ Impelling] (वृषाणम्) = धर्म की ओर प्रेरित करनेवाला है व शक्तिशाली बनानेवाला है और (अरुषम्) = आरोचमान-प्रकाशमय है। इस प्रकार का यह वज्र 'ज्ञान' ही है । इनके ज्ञान को बढ़ाकर इन की अशुभ वृत्तियों को दूर करिये। राजा को भी राष्ट्र में इस ज्ञानवज्र के द्वारा दुष्टता को दूर करने का सदा प्रयत्न करना चाहिए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानरूप वज्र के द्वारा दुष्ट आचरणवाले पुरुषों की दुष्टता को दूर किया जाये ।