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प्र ये मि॒त्रं प्रार्य॒मणं॑ दु॒रेवा॒: प्र सं॒गिर॒: प्र वरु॑णं मि॒नन्ति॑ । न्य१॒॑मित्रे॑षु व॒धमि॑न्द्र॒ तुम्रं॒ वृष॒न्वृषा॑णमरु॒षं शि॑शीहि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra ye mitram prāryamaṇaṁ durevāḥ pra saṁgiraḥ pra varuṇam minanti | ny amitreṣu vadham indra tumraṁ vṛṣan vṛṣāṇam aruṣaṁ śiśīhi ||

पद पाठ

प्र । ये । मि॒त्रम् । प्र । अ॒र्य॒मण॑म् । दुः॒ऽएवाः॑ । प्र । स॒म्ऽगिरः॑ । प्र । वरु॑णम् । मि॒नन्ति॑ । नि । अ॒मित्रे॑षु । व॒धम् । इ॒न्द्र॒ । तुम्र॑म् । वृष॑न् । वृषा॑णम् । अ॒रु॒षम् । शि॒शी॒हि॒ ॥ १०.८९.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:89» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:15» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ये दुरेवाः) जो दुष्ट गतिवाले-दुर्व्यवहारकर्त्ता जन (मित्रं प्र मिनन्ति) मित्र को मारते हैं (अर्यमणं प्र) अन्नदाता को मारते हैं (सङ्गिरः-प्र) सम्यक् स्तुति करनेवाले ध्यानिजन को मारते हैं (वरुणं प्र) वरनेवाले-रक्षक को मारते हैं (वृषन्-इन्द्र) हे सुखवर्षक-ऐश्वर्यवान् परमात्मन् ! तू (अमित्रेषु) उन ऐसे शत्रुओं के निमित्त (तुम्रं वृषाणम्-अरुषम्) गतिशील प्रबल तीक्ष्ण (वधं नि शिशीहि) घातक वज्र को तीक्ष्ण कर ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो दुर्व्यवहार करनेवाले दुष्टजन, मित्र, अन्नदाता, ज्ञानदाता, ध्यानी उपासक रक्षक को पीड़ित करते हैं, उन ऐसे जनों के निमित्त परमात्मा तीक्ष्ण वज्र से प्रहार करता है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दुरेव पुरुषों का नाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (दुरेवा:) = दुष्ट गमनों [= आचरणों] वाले (मित्रम्) = मित्र द्वेषता को (प्रमिनन्ति) = हिंसित करते हैं, अर्थात् मित्रता [ = स्नेह की भावना] का विलोप करते हैं। इसी प्रकार जो (अर्यमणम्) = अर्यमा देव को (प्र) [ मिनन्ति ] = नष्ट करते हैं, [ अरीन् यच्छति] कामादि शत्रुओं के जीतने के भाव को नष्ट करते हैं । (संगिर:) = उत्तम ज्ञानप्रद वाणियों व स्तुति वाणियों का (प्र) [ मिनन्ति ] = नाश करते हैं, अर्थात् जो स्वाध्याय व स्तवन को छोड़ देते हैं, (वरुणम्) = वरुण देवता को (प्र) [ मिनन्ति ] = नष्ट करते हैं, अर्थात् निर्देषता के भाव से दूर होकर द्वेषमय जीवनवाले हो जाते हैं। उन अमित्रेषु -अमित्रों पर, स्नेहरहित जनों पर अपने को पाप व मृत्यु से न बचानेवालों पर, (हे इन्द्र) = सब आसुरवृत्तियों का संहार करनेवाले प्रभो ! (वृषन्) = शक्तिशाली प्रभो ! (वधम्) = उस नाशक अस्त्र को, वज्र को (शिशीहि) = तीक्ष्ण करिये जो (तुम्रम्) = गतिशील है [ Impelling] (वृषाणम्) = धर्म की ओर प्रेरित करनेवाला है व शक्तिशाली बनानेवाला है और (अरुषम्) = आरोचमान-प्रकाशमय है। इस प्रकार का यह वज्र 'ज्ञान' ही है । इनके ज्ञान को बढ़ाकर इन की अशुभ वृत्तियों को दूर करिये। राजा को भी राष्ट्र में इस ज्ञानवज्र के द्वारा दुष्टता को दूर करने का सदा प्रयत्न करना चाहिए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानरूप वज्र के द्वारा दुष्ट आचरणवाले पुरुषों की दुष्टता को दूर किया जाये ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ये दुरेवाः) ये दुर्व्यवहारकर्त्तारः-दुष्टमेरः प्रापणं गमनं येषां ते जनाः (मित्र प्र मिनन्ति) मित्रं हिंसन्ति (अर्यमणं प्र) दातारम् “अर्यमेति तमाहुर्यो ददाति” [तै० १।१।२।४] (सङ्गिरः-प्र) सम्यक्स्तुतिकर्तारं ध्यानिनं हिंसन्ति (वरुणं प्र) वरयितारं रक्षकं हिंसन्ति (वृषन्-इन्द्र) हे सुखवर्षक परमात्मन् ! त्वम् (अमित्रेषु) तथाभूतेषु शत्रुषु (तुम्रं वृषाणम्-अरुषं वधं नि शिशीहि) गतिशीलं प्रबलं तीक्ष्णं घातकवज्रं “वधं वज्रनाम” [निघं० २।२०] तीक्ष्णीकुरु ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And against those crooked men of unholy ways who deceive the friend, violate the progressive man of justice and rectitude, hurt dedicated men of positive social support and oppose the man of judgement and enlightenment, O lord of power and progress, Indra, prepare the thunderbolt, instant, overwhelming and blazing but just and unquestionable, and strike such unfriendly and negative forces without delay.