पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार सोमरक्षण से ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाला पुरुष (वृत्रम्) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को इस प्रकार (जघान) = नष्ट करता है, (इव) = जैसे कि (स्वधितिः) = कुल्हाड़ा (वना) = वनों को नष्ट कर डालता है। [२] इसी प्रकार यह सोमरक्षक पुरुष (पुरः रुरोज) = शत्रुओं की पुरियों का भंग करता है, न उसी प्रकार जैसे कि एक राजा पृथ्वी का विदारण करके (सिन्धून् अरदत्) = नहरों को बना डालता है। पृथ्वी का विलेखन करके जैसे नदी प्रवाह चलता है इसी प्रकार यह असुर पुरियों का विदारण करके ही तो देवगृहों का अपने में स्थापन करता है। काम अपना अधिष्ठान इन्द्रियों में बनाता है, क्रोध मन में तथा लोभ बुद्धि में । असुरों के ये तीन अधिष्ठान ही उनकी तीन पुरियाँ हैं । इनका विदारण यह सोमी करता है । [३] (गिरिम्) = यह सोमी अविद्या पर्वत को [पाँच पर्वोंवाली होने से अविद्या पर्वत है] (विभेद) = विनष्ट करता है, उसी प्रकार आसानी से (इव) = जैसे कि (इत्) = निश्चय से (नवं कुम्भम्) = अभी ताजे बने घड़े को । जो घड़ा अभी बना ही है, न सूखा है, न पका है, उसका तोड़ना जैसे कुछ कठिन नहीं, इसी प्रकार सोमी के लिये अविद्या पर्वत को तोड़ना कठिन नहीं। [४] इस अविद्या पर्वत को विदीर्ण करके (इन्द्र:) = यह जितेन्द्रिय पुरुष (स्वयुग्भिः) = आत्मतत्त्व से मेलवाली प्रत्याहार द्वारा विषय व्यावृत्त इन्द्रियों से (गाः) = ज्ञान की वाणियों को (आ अकृणोत) = अपने में समन्तात् करनेवाला होता है, अर्थात् खूब ही ज्ञान का अपने में वर्धन कर पाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम का रक्षक वृत्र को [वासना को] नष्ट करता है, काम-क्रोध-लोभ के किलों को तोड़ देता है, अविद्या पर्वत को गिरा देता है और विषयव्यावृत्त इन्द्रियों से खूब ही ज्ञान का वर्धन करता है ।