पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्य सोमः अक्षा:) = [ अश् to pervnde] जिसके जीवन में सोम, न नष्ट होकर, शरीर में ही व्याप्त होनेवाला होता है, उसे (न द्यावापृथिवी) = न द्युलोक, ना ही पृथिवीलोक, (न धन्व) = न मरुस्थल, (न अन्तरिक्षम्) = न यह जलवाष्पों से पूर्ण अन्तरिक्ष और (न अद्रयः) = न पर्वत [देभुः] हिंसित करते हैं। ['देभुः' क्रिया उपरले मन्त्र से आवृत्त होती है] । अर्थात् सोम का रक्षण होने पर सर्वत्र स्वास्थ्य ठीक रहता है । इसे मरुस्थल में गरमी नहीं लगती और पर्वतों पर ठण्डक नहीं सताती। आकाश में इसका दिल धड़कने नहीं लगता और पृथ्वी पर इसे भारीपन नहीं महसूस होता । सुरक्षित सोम इसे सर्वत्र स्वस्थ रखता है । [२] (यत्) = जब (अस्य) = इसके रक्षण से उत्पन्न होनेवाला (मन्युः) = ज्ञान (अधिनिधीयमानः) = आधिक्येन स्थापित होता है तो यह सोम रक्षक पुरुष (वीडु) = दृढ़-अत्यन्त प्रबल भी वासनारूप शत्रुओं को (शृणाति) = शीर्ण करनेवाला होता है और (स्थिराणि) = शरीर में दृढ़ मूल हुए हुए भी रोगों का (रुजति) = भंग करनेवाला होता है। यह सोम ही वह ' मन्त्र - तन्त्र - यन्त्र' है जो सब अवाञ्छनीय तत्त्वों को दूर भगा देता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से सर्वत्र स्वास्थ्य ठीक रहता है। वासनाएँ भी दूर होती हैं, रोग भी नष्ट हो जाते हैं।