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देवता: इन्द्र: ऋषि: रेणुः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

इन्द्रा॑य॒ गिरो॒ अनि॑शितसर्गा अ॒पः प्रेर॑यं॒ सग॑रस्य बु॒ध्नात् । यो अक्षे॑णेव च॒क्रिया॒ शची॑भि॒र्विष्व॑क्त॒स्तम्भ॑ पृथि॒वीमु॒त द्याम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāya giro aniśitasargā apaḥ prerayaṁ sagarasya budhnāt | yo akṣeṇeva cakriyā śacībhir viṣvak tastambha pṛthivīm uta dyām ||

पद पाठ

इन्द्रा॑य । गिरः॑ । अनि॑शितऽसर्गाः । अ॒पः । प्र । ई॒र॒य॒म् । सग॑रस्य । बु॒ध्नात् । यः । अक्षे॑णऽइव । च॒क्रिया॑ । शची॑भिः । विष्व॑क् । त॒स्तम्भ॑ । पृ॒थि॒वीम् । उ॒त । द्याम् ॥ १०.८९.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:89» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राय) ऐश्वर्यवान् परमात्मा के लिये (अनिशितसर्गाः) अननुकूल प्रवाहवाले (अपः-गिरः) जलों के समान स्तुतियाँ (प्रेरयम्) प्रेरित कर (सगरस्य बुध्नात्) आकाश के प्रदेश हृदय से (यः) जो परमात्मा (अक्षेण-इव शचीभिः-चक्रिया) अक्षदण्ड से जैसे चक्रों को कर्मों से (पृथिवीम्-उत द्याम्) पृथिवी और द्युलोक को (विष्वक् तस्तम्भ) व्याप्ति से सम्भाल रहा है ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के लिये न रुकनेवाले स्तुतिप्रवाहों को ही प्रेरित करना चाहिए, जो अपनी व्याप्ति से द्युलोक पृथिवी चक्रों के समान चला रहा, सम्भाल रहा है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अधिकाधिक स्तवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] मैं (सगरस्य बुध्नात्) = [सगर= अन्तरिक्ष नाम नि० १ । ३] हृदयान्तरिक्ष के मूल से, हृदय के अन्तस्तल से इन्द्राय उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिये (अनिशितसर्गा:) = [अतनूकृत विसर्गाः सा० ] न शिथिल हुई हुई (गिरः) = स्तुति वाणियों को तथा (अपः) = कर्मों को (प्रेरयम्) = प्रेरित करता हूँ । अर्थात् मेरी वाणी अधिकाधिक प्रभु का स्तवन करनेवाली होती है और मैं जो कर्म करता हूँ सब प्रभु के अर्पण करनेवाला होता हूँ। [२] उस प्रभु का मैं अधिकाधिक स्तवन करता हूँ (यः) = जो (अक्षेणेव चक्रिया इव) = धुरे axle से पहियों की तरह (विष्वक् शचीभिः) = सर्वत्र व्याप्त होनेवाले इनका प्रज्ञानों व कर्मों से (पृथिवीम्) = पृथिवी को (उत) = और (द्याम्) = द्युलोक को (तस्तम्भ) = थामते हैं, धारण करते हैं। प्रभु उपासक के भी मस्तिष्करूप द्युलोक को तथा शरीर रूप पृथिवी को धारण करनेवाले हैं। सम्पूर्ण ज्ञान व शक्ति के स्रोत प्रभु ही हैं, वे ही हमारे मस्तिष्क को ज्योतिर्मय तथा शरीर को शक्ति सम्पन्न करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं प्रभु का स्तवन करता हूँ। सब कर्मों को प्रभु के प्रति अर्पित करता हूँ । प्रभु ही द्युलोक व पृथिवीलोक का धारण करते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राय) ऐश्वर्यपते परमात्मने (अनिशितसर्गाः) अननुकूलप्रवाहाः (अपः-गिरः) अप इव स्तुतीः (प्रेरयम्) प्रेरय “पुरुषव्यत्ययेनोत्तम-पुरुषः” (सगरस्य बुध्नात्) अन्तरिक्षास्याकाशस्य प्रदेशात्-हृदयात् “सगरोऽन्तरिक्षम्” [निघं० १।३] (यः) य इन्द्रः परमात्मा (अक्षेण-इव शचीभिः-चक्रिया) अक्षदण्डेन यथा चक्राणि कर्मभिः “चक्रात्” “डिया प्रत्ययश्छान्दसः” तथा (पृथिवीम् उत द्यां विष्वक् तस्तम्भ) पृथिवीं द्यां च द्यावापृथिव्यौ व्याप्त्या स्तम्भयति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I sing songs of praise and make incessant streams of water flow from the oceans of space and sky in honour of Indra who, with his cosmic power and actions, sustains the heaven and earth in motion like wheels of a chariot held in balance by the axle.