पदार्थान्वयभाषाः - [१] मैं (सगरस्य बुध्नात्) = [सगर= अन्तरिक्ष नाम नि० १ । ३] हृदयान्तरिक्ष के मूल से, हृदय के अन्तस्तल से इन्द्राय उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिये (अनिशितसर्गा:) = [अतनूकृत विसर्गाः सा० ] न शिथिल हुई हुई (गिरः) = स्तुति वाणियों को तथा (अपः) = कर्मों को (प्रेरयम्) = प्रेरित करता हूँ । अर्थात् मेरी वाणी अधिकाधिक प्रभु का स्तवन करनेवाली होती है और मैं जो कर्म करता हूँ सब प्रभु के अर्पण करनेवाला होता हूँ। [२] उस प्रभु का मैं अधिकाधिक स्तवन करता हूँ (यः) = जो (अक्षेणेव चक्रिया इव) = धुरे axle से पहियों की तरह (विष्वक् शचीभिः) = सर्वत्र व्याप्त होनेवाले इनका प्रज्ञानों व कर्मों से (पृथिवीम्) = पृथिवी को (उत) = और (द्याम्) = द्युलोक को (तस्तम्भ) = थामते हैं, धारण करते हैं। प्रभु उपासक के भी मस्तिष्करूप द्युलोक को तथा शरीर रूप पृथिवी को धारण करनेवाले हैं। सम्पूर्ण ज्ञान व शक्ति के स्रोत प्रभु ही हैं, वे ही हमारे मस्तिष्क को ज्योतिर्मय तथा शरीर को शक्ति सम्पन्न करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं प्रभु का स्तवन करता हूँ। सब कर्मों को प्रभु के प्रति अर्पित करता हूँ । प्रभु ही द्युलोक व पृथिवीलोक का धारण करते हैं ।