पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्मा) = इस प्रभु के लिये (अनपावृत्) = [अपगतिरहितं सा० ] अपगति से रहित रूप में, अर्थात् बीच में विच्छेद न हो जानेवाले रूप में (समानम्) = सदा समानरूप से (अर्च) = अर्चना करनेवाला हो। उस प्रभु की अर्चना करनेवाला हो, जो प्रभु क्(ष्मया दिवः असमम्) = पृथ्वी व द्युलोक के समान नहीं हैं, अर्थात् पृथ्वी व द्युलोक से अत्यन्त महान् हैं । (ब्रह्म) = [बृहि वृद्धौ] सब गुणों के दृष्टिकोण से बढ़े हुए हैं, सब गुणों की चरमसीमा हैं । प्रत्येक गुण उस प्रभु में निरतिशय रूप से है । इसीलिए वे प्रभु (नव्यम्) = अत्यन्त स्तुति के योग्य हैं । [ नु स्तुतौ] [२] वे प्रभु (अर्य:) = स्वामी हैं, सारे ब्रह्माण्ड के अधिपति हैं, सब जीवों का भी नियन्त्रण करनेवाले हैं । (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली (यः) = जो प्रभु हैं वे (जनिमानि) = सब मनुष्यों को पृष्ठा इव अपनी पीठों के समान [backbone] (चिकाय) = जानते हैं । जीव न हों तो प्रभु को जाने ही कौन ? जैसे राजा का आधार प्रजा पर है, प्रजा न हो तो राजा क्या ? इसी प्रकार जीवों के अभाव में प्रभु की स्थिति है। जीव ही प्रभु को जानते हैं और उसकी महिमा का प्रतिपादन करते हैं। जीव ही प्रभु के पृष्ठ पोषक हैं। वे प्रभु भी (सखायम्) = अपने मित्रभूत इस जीव को (न ईषे) = [ ईष् to kill ] नष्ट नहीं होने देते। जो जीव प्रभु का उपासक बनता है, वह प्रभु ज्ञान का प्रसार करता है और प्रभु इस उपासक को काम- क्रोधादि से हिंसित होने से बचाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें सदा प्रभु का उपासन करना चाहिए। उपासना में विच्छेद न हो । प्रभु हमें नष्ट होने से बचाएँगे ।