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स॒मा॒नम॑स्मा॒ अन॑पावृदर्च क्ष्म॒या दि॒वो अस॑मं॒ ब्रह्म॒ नव्य॑म् । वि यः पृ॒ष्ठेव॒ जनि॑मान्य॒र्य इन्द्र॑श्चि॒काय॒ न सखा॑यमी॒षे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

samānam asmā anapāvṛd arca kṣmayā divo asamam brahma navyam | vi yaḥ pṛṣṭheva janimāny arya indraś cikāya na sakhāyam īṣe ||

पद पाठ

स॒मा॒नम् । अ॒स्मै॒ । अन॑पऽवृत् । अ॒र्च॒ । क्ष्म॒या । दि॒वः । अस॑मम् । ब्रह्म॑ । नव्य॑म् । वि । यः । पृ॒ष्ठाऽइ॑व । जनि॑मानि । अ॒र्यः । इन्द्रः॑ । चि॒काय॑ । न । सखा॑यम् । ई॒षे ॥ १०.८९.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:89» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (अर्यः) सारे जगत् का स्वामी (पृष्ठा-इव जनिमानि) जायमान जीवात्माओं को (वि चिकाय) विशेषरूप से जानता है (सखायं न-ईषते) वह अपने उपासक सखा को हिंसित नहीं करता है (ब्रह्म) वह ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध है (नव्यम्) वह ब्रह्म स्तुति करने योग्य है (समानम्) सबके लिये समान है निष्पक्ष है (अनपवृत्) पृथक् नहीं किन्तु सर्वान्तर्यामी है (क्ष्मया दिवः-असमम्) पृथिवी से द्युलोक से समता रखनेवाला-एकदेशी नहीं है (अस्मै) इसके लिये (अर्च) स्तुति कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा जगत् का स्वामी महान् आत्माओं को जाननेवाला सर्वान्तर्यामी निष्पक्ष है, उसकी स्तुति करनी चाहिए ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अविच्छिन्न उपासना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्मा) = इस प्रभु के लिये (अनपावृत्) = [अपगतिरहितं सा० ] अपगति से रहित रूप में, अर्थात् बीच में विच्छेद न हो जानेवाले रूप में (समानम्) = सदा समानरूप से (अर्च) = अर्चना करनेवाला हो। उस प्रभु की अर्चना करनेवाला हो, जो प्रभु क्(ष्मया दिवः असमम्) = पृथ्वी व द्युलोक के समान नहीं हैं, अर्थात् पृथ्वी व द्युलोक से अत्यन्त महान् हैं । (ब्रह्म) = [बृहि वृद्धौ] सब गुणों के दृष्टिकोण से बढ़े हुए हैं, सब गुणों की चरमसीमा हैं । प्रत्येक गुण उस प्रभु में निरतिशय रूप से है । इसीलिए वे प्रभु (नव्यम्) = अत्यन्त स्तुति के योग्य हैं । [ नु स्तुतौ] [२] वे प्रभु (अर्य:) = स्वामी हैं, सारे ब्रह्माण्ड के अधिपति हैं, सब जीवों का भी नियन्त्रण करनेवाले हैं । (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली (यः) = जो प्रभु हैं वे (जनिमानि) = सब मनुष्यों को पृष्ठा इव अपनी पीठों के समान [backbone] (चिकाय) = जानते हैं । जीव न हों तो प्रभु को जाने ही कौन ? जैसे राजा का आधार प्रजा पर है, प्रजा न हो तो राजा क्या ? इसी प्रकार जीवों के अभाव में प्रभु की स्थिति है। जीव ही प्रभु को जानते हैं और उसकी महिमा का प्रतिपादन करते हैं। जीव ही प्रभु के पृष्ठ पोषक हैं। वे प्रभु भी (सखायम्) = अपने मित्रभूत इस जीव को (न ईषे) = [ ईष् to kill ] नष्ट नहीं होने देते। जो जीव प्रभु का उपासक बनता है, वह प्रभु ज्ञान का प्रसार करता है और प्रभु इस उपासक को काम- क्रोधादि से हिंसित होने से बचाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें सदा प्रभु का उपासन करना चाहिए। उपासना में विच्छेद न हो । प्रभु हमें नष्ट होने से बचाएँगे ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः-इन्द्रः-अर्यः) य ऐश्वर्यवान् सर्वस्य जगतः स्वामी (पृष्ठा इव जनिमानि वि चिकाय) आत्मनः जायमानान् “आत्मा वै पृष्ठानि” [को० २५।१२] “इवोऽपि दृश्यते” [निरु० १।११] इति पदपूरण इव शब्दः विजानाति (न सखायम्-ईषते) स सखायमुपासकं, न हिनस्ति ‘ईष गतिहिंसादर्शनेषु” [भ्वादि०] (ब्रह्म) ‘ब्रह्म’ इति नामतः प्रसिद्धं (नव्यम्) स्तुतियोग्यम् “णु स्तुतौ” [अदादि०] (समानम्) सर्वेभ्यः समानं निष्पक्षं (अनपवृत्) न पृथग्वर्तमानं सर्वान्तर्यामि (क्ष्मया-दिवः-असमम्) द्यावापृथिव्योर्न सममपि तु ततोऽतिमहदस्ति (अस्मै) अस्मै ब्रह्मणे (अर्च) स्तवनं कुरु ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Worship Indra, constant, evident and immanent, greater than heaven and earth, infinite, adorable ever new, who, as primary foundation and ultimate master, knows all that are born in existence and neither deserts friends nor hurts the devotees.