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ए॒वा ते॑ व॒यमि॑न्द्र भुञ्जती॒नां वि॒द्याम॑ सुमती॒नां नवा॑नाम् । वि॒द्याम॒ वस्तो॒रव॑सा गृ॒णन्तो॑ वि॒श्वामि॑त्रा उ॒त त॑ इन्द्र नू॒नम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā te vayam indra bhuñjatīnāṁ vidyāma sumatīnāṁ navānām | vidyāma vastor avasā gṛṇanto viśvāmitrā uta ta indra nūnam ||

पद पाठ

ए॒व । ते॒ । व॒यम् । इ॒न्द्र॒ । भु॒ञ्ज॒ती॒नाम् । वि॒द्याम॑ । सु॒ऽम॒ती॒नाम् । नवा॑नाम् । वि॒द्याम॑ । वस्तोः॑ । अव॑सा । गृ॒णन्तः॑ । वि॒श्वामि॑त्राः । उ॒त । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । नू॒नम् ॥ १०.८९.१७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:89» मन्त्र:17 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:7 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:17


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (एव) ऐसे (वयं विश्वामित्राः) हम सब के मित्र (ते) तेरी  (भुञ्जतीनाम्) पालन करती हुई-रक्षा करती हुई (नवानां सुमतीनाम्) प्रशंसनीय कल्याणवाणियों-वेदवाणियों को (विद्याम) जानें (उत) और (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (ते-अवसा) तेरी रक्षा-कृपा से (वस्तोः) प्रतिदिन (नूनं गृणन्तः) अवश्य स्तुति करते हुए (विद्याम) हम तुझे प्राप्त करें ॥१७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की दी हुई वेदवाणियाँ मनुष्यों के लिये रक्षा करनेवाली कल्याणकारिणी हैं, उसकी कृपा से उन्हें जानें तथा प्रतिदिन स्तुति करते हुए परमात्मा को प्राप्त करें ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विश्वामित्र ही प्रभु-भक्त है

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एवा) = इस प्रकार अर्थात् गतमन्त्र के अनुसार 'यज्ञ - स्तुति व सम्मिलित प्रार्थना' को अपनाते हुए (वयम्) = हम हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (ते) = आपकी (भुञ्जतीनाम्) = हमारा पालन करनेवाली (नवानाम्) = [ नु स्तुतौ ] स्तुति के योग्य - प्रशंसनीय (सुमतीनां विद्याम) = सुमतियों को जानें। अर्थात् हमें वह उत्तम बुद्धि प्राप्त हो जो उत्तमता से पालन करनेवाली हो । [२] (अवसा) = रक्षण के हेतु से (गृणन्तः) = आपका स्तवन करते हुए हम (वस्तोः) = [propesty possession wealth] निवास के लिये आवश्यक धन को (विद्याम) = प्राप्त करें। [३] (उत) = और (विश्वामित्राः) = सबके साथ स्नेह से वर्तते हुए हम (नूनम्) = निश्चय से हे (इन्द्र) = परमात्मन् ! (ते) = आपके ही हों । प्रभु-भक्त व प्रभु प्रिय वही होता है जो किसी से द्वेष नहीं करता 'सर्वभूत हिते रताः ' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-हमें प्रभु से सुबुद्धि प्राप्त हो, धन प्राप्त हो और हम सबके प्रति स्नेहवाले होकर प्रभु के हो जाएँ ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (एव) एवं (वयं विश्वामित्राः) वयं सर्वेषां मित्रभूताः  “विश्वामित्रः-सर्वमित्रः” [निरु० २।२५] “विश्वामित्रः सर्वेषां सुहृत्” [ऋ० ३।५६।९ दयानन्दः] (ते) तव (भुञ्जतीनां नवानां सुमतीनां विद्याम) रक्षन्तीः “भुज-पालनाभ्यवहारयोः” [रुधादिः] ‘अत्र पालनार्थः परस्मैपदत्वात्’ प्रशंसनीयाः कल्याणवाचः “वाग्वै मतिः” [श० २१।८।१।२।७] वेदवाचः “द्वितीयास्थाने षष्ठी व्यत्ययेन” जानीयाम (उत) अपि च (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (ते अवसा) तव रक्षणेन कृपया (वस्तोः) प्रतिदिनम् “वस्तोः-दिनं दिनम्” [यजुः ३।८ दयानन्दः] (नूनं गृणन्तः विद्याम) अवश्यं स्तुवन्तस्त्वां लभेमहि ॥१७॥ 
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus may we, O lord omnipotent, Indra, know of, experience and enjoy your protective, enlightening and ever new gifts of kindness and grace. And may we, being friends of the world, singing and celebrating your divine gifts, know you and be happy by your favour and protection day and night.