वांछित मन्त्र चुनें

पु॒रूणि॒ हि त्वा॒ सव॑ना॒ जना॑नां॒ ब्रह्मा॑णि॒ मन्द॑न्गृण॒तामृषी॑णाम् । इ॒मामा॒घोष॒न्नव॑सा॒ सहू॑तिं ति॒रो विश्वाँ॒ अर्च॑तो याह्य॒र्वाङ् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

purūṇi hi tvā savanā janānām brahmāṇi mandan gṛṇatām ṛṣīṇām | imām āghoṣann avasā sahūtiṁ tiro viśvām̐ arcato yāhy arvāṅ ||

पद पाठ

पु॒रूणि॑ । हि । त्वा॒ । सव॑ना । जना॑नाम् । ब्रह्मा॑णि । मन्द॑न् । गृ॒ण॒ताम् । ऋषी॑णाम् । इ॒माम् । आ॒ऽघोष॑न् । अव॑सा । सऽहू॑तिम् । ति॒रः । विश्वा॑न् । अर्च॑तः । या॒हि॒ । अ॒र्वाङ् ॥ १०.८९.१६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:89» मन्त्र:16 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:16


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वा) हे परमात्मन् ! तुझे (जनानाम्) मनुष्यों के (पुरूणि हि)  बहुत ही-सब ही (सवना) यजनकर्म, तथा (गृणताम्-ऋषीणाम्) स्तुति करनेवाले मन्त्रद्रष्टाओं के (ब्रह्माणि) मन्त्रवचनों को स्तुतिवचनों को (मन्दन्) हर्षित होता हुआ (इमां सहूतिम्) इस सहमन्त्रणा को (आघोषन्) आघोषित करता हुआ-स्वीकार करता हुआ (अवसा) रक्षणहेतु (विश्वान्-अर्चतः) सब स्तुति करनेवाले जनों को (तिरः) अन्तर्दृष्टि से (अर्वाङ् याहि) साक्षात् हो ॥१६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सब होमयाजी जनों के यजनकर्मों को तथा आत्मयाजी जनों के मन्त्रवचनों स्तुतिवचनों को स्वीकार करता है। इस प्रकार सब अर्चना करनेवालों को अन्तर्दृष्टि से साक्षात् होता है ॥१६॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ, स्तवन व सम्मिलित प्रार्थना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्रों के अनुसार शान्त सामाजिक वातावरण में (हि) = निश्चय से (जनानाम्) = लोगों के (पुरूणि सवना) = पालन व पूरण करनेवाले यज्ञ (त्वा) = हे प्रभो ! आपको (मन्दन्) = हर्षित करते हैं । इसी प्रकार (गृणताम्) = स्तवन करते हुए (ऋषीणाम्) = तत्त्वद्रष्टा पुरुषों के (ब्रह्माणि) = स्तोत्र भी आपको आनन्दित करते हैं । अर्थात् शान्त वातावरण में लोग यज्ञों व प्रभु-स्तवन में प्रवृत्त होते हैं । इन अपने कार्यों से वे प्रभु के प्रिय बनते हैं । [२] इस समय ये लोग (अवसा) = रक्षण के हेतु से (इमाम्) = इस (सूहितम्) = [congregetional preyes] सामूहिक प्रार्थना को मिलकर की जानेवाली प्रार्थना को (आघोषन्) = उच्चारण करते हैं। इस सम्मिलित प्रार्थना से वे अपने वातावरण को पवित्र बनाते हैं। [३] आप इन (विश्वान् अर्चतः) = सब उपासकों को (तिरः) = गुप्तरूप में (अर्वाड्) = हृदयाकाश के भीतर (याहि) = प्राप्त होइये। ये उपासक अपने हृदयों में आपके प्रकाश को देख पायें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - 'यज्ञ, स्तवन व सम्मिलित प्रार्थनाएँ' हमें प्रभु के प्रकाश को देखने योग्य बनाती हैं।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वा) हे परमात्मन् ! त्वां (जनानां पुरूणि हि सवना) जनानां बहूनि यजनकर्माणि, तथा (गृणताम्-ऋषीणां ब्रह्माणि) स्तुवतां मन्त्रद्रष्टॄणां मन्त्रवचनानि स्तवनानि (मन्दन्) मोदयन्ति (इमां सहूतिम्-आघोषन्) इमां सहमन्त्रणां त्वमाघोषयन् स्वीकुर्वन् (अवसा) रक्षणहेतुना (विश्वान्-अर्चतः) सर्वान्-स्तुवतो जनान् (तिरः-अर्वाङ् याहि) अन्तर्दृष्ट्या “तिरोदधे-अन्तर्धत्ते” (निरु०) साक्षाद् भव ॥१६॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May all felicitative yajnas of the people and holy songs of celebrant seers adore and exalt you. O lord, listening to this prayer and invocation, proclaiming your acceptance and pleasure, come to all the devotees in direct experience and bless them with peace and protection.