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देवता: इन्द्र: ऋषि: रेणुः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

श॒त्रू॒यन्तो॑ अ॒भि ये न॑स्तत॒स्रे महि॒ व्राध॑न्त ओग॒णास॑ इन्द्र । अ॒न्धेना॒मित्रा॒स्तम॑सा सचन्तां सुज्यो॒तिषो॑ अ॒क्तव॒स्ताँ अ॒भि ष्यु॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śatrūyanto abhi ye nas tatasre mahi vrādhanta ogaṇāsa indra | andhenāmitrās tamasā sacantāṁ sujyotiṣo aktavas tām̐ abhi ṣyuḥ ||

पद पाठ

श॒त्रु॒ऽयन्तः॑ । अ॒भि । ये । नः॒ । त॒त॒स्रे । महि॑ । व्राध॑न्तः । ओ॒ग॒णासः॑ । इ॒न्द्र॒ । अ॒न्धेन॑ । अ॒मित्राः॑ । तम॑सा । स॒च॒न्ता॒म् । सु॒ऽज्यो॒तिषः॑ । अ॒क्तवः॑ । तान् । अ॒भि । स्यु॒रिति॑ स्युः ॥ १०.८९.१५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:89» मन्त्र:15 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:15


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (ये) जो (ओगणासः) अवगण-नीचसङ्घ (नः) हमें (शत्रूयन्तः) अपना शत्रु मानते हुए (महि व्राधन्तः) महत् बाधा पीड़ा देते हुए (अभि ततस्रे) नष्ट कर रहे हैं (अभि) सब ओर से वे शत्रुजन (अन्धेन तमसा) घने अन्धकार से (सचन्ताम्) संगत हों (सुज्योतिषः-अक्तवः) तीक्ष्ण तेजवाले दिन-रात (तान् अभिष्युः) उन्हें अभिभूत करें ॥१५॥
भावार्थभाषाः - शत्रुता करनेवाले पीड़ा पहुँचानेवाले नीचसङ्घ घने अन्धकार से संगत हो जाते हैं और उनके दिन-रात भी तीक्ष्ण तेज से उन्हें तपाते हैं ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुधार के लिए पृथक्करण व ज्ञान देना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (शत्रूयन्तः) = शत्रु के समान आचरण करते हुए (नः) = हमें (अभिततस्त्रे) = इधर-उधर उत्शिप्त करते हैं, (महि व्राधन्तः) = हमें महान् पीड़ा पहुँचाते हैं, हमारी बहुत बाधाओं का कारण बनते हैं, (ओगणास:) = संघ [gang] बनाकर अपना पीड़ा पहुँचाने का कार्य करते हैं। हे (इन्द्र) = प्रभो ! वे (अमित्राः) = सबका अहित चाहनेवाले लोग (अन्धेन तमसा सचन्ताम्) = अन्धतमस् से, घने अन्धेरे से युक्त हों । अर्थात् उन्हें समाज से पृथक् करके कारागार में अलग कमरे में रखा जाये। और वहाँ उनके (अभि) = दोनों और (सुज्योतिषः अक्तवः) = उत्तम ज्योतिवाली ज्ञान की रश्मियाँ (स्युः) = हों । अर्थात् उन्हें प्रातः- सायं दोनों समय उत्तम ज्ञान प्राप्त कराया जाए। इस ज्ञान के द्वारा उनकी वृत्ति को ठीक करने का प्रयत्न किया जाए। [२] सुधार के लिये आवश्यक है कि उसको पहले वातावरण से अलग किया जाए। इसी दृष्टिकोण से यहाँ कहा गया है कि वे अन्धतमस् से युक्त हों। एकदम उन्हें अलग करके रखा जाए, उनका संसार परिवर्तित ही हो जाए। इसके बाद उन्हें प्रातः - सायं ज्ञान देने का प्रयत्न किया जाए। दिन में विविध कार्यों में व्यापृत रखा जाए। ज्ञान के द्वारा उनके जीवन में पवित्रता के संचार का यत्न हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-औरों को हिंसित व विघ्रित करनेवाले लोगों को समाज से पृथक् करके सुधारने के लिए यत्न हो । उन्हें प्रतिदिन ज्ञान को देने की व्यवस्था की जाए ताकि उनकी प्रवृत्तियाँ परिवर्तित हो जाएँ ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (ये) खलु (ओगणासः) अवगणाः नीचगणाः (नः) अस्मान् (शत्रूयन्तः) शत्रुत्वमाचरन्तः (महि व्राधन्तः) महत् अत्यन्तं हिंसन्तः “व्राधन्तं वा धन्तं व्याधमिव हिंसन्तम्” [ऋ० ४।३२।३ दयानन्दः] (अभिततस्रे) अभि-उपक्षिण्वन्ति नाशयन्ति “तसु उपक्षये” [दिवादि०] (अभि) अभितः, शत्रवः (अन्धेन तमसा सचन्ताम्) महतान्धकारेण सङ्गच्छन्तां (सुज्योतिषा-अक्तवः) तीक्ष्णप्रकाशवन्तो दिवसा रात्रयश्च (तान्-अभिष्युः) तानभिभवेयुः-बाधेरन् ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Enemies of humanity, obstructionist forces, highly organised gangs which afflict us, may all unfriendly forces suffer deep darkness on their way, and may the powers of enlightenment and progressive culture face them and overcome them.