सुधार के लिए पृथक्करण व ज्ञान देना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (शत्रूयन्तः) = शत्रु के समान आचरण करते हुए (नः) = हमें (अभिततस्त्रे) = इधर-उधर उत्शिप्त करते हैं, (महि व्राधन्तः) = हमें महान् पीड़ा पहुँचाते हैं, हमारी बहुत बाधाओं का कारण बनते हैं, (ओगणास:) = संघ [gang] बनाकर अपना पीड़ा पहुँचाने का कार्य करते हैं। हे (इन्द्र) = प्रभो ! वे (अमित्राः) = सबका अहित चाहनेवाले लोग (अन्धेन तमसा सचन्ताम्) = अन्धतमस् से, घने अन्धेरे से युक्त हों । अर्थात् उन्हें समाज से पृथक् करके कारागार में अलग कमरे में रखा जाये। और वहाँ उनके (अभि) = दोनों और (सुज्योतिषः अक्तवः) = उत्तम ज्योतिवाली ज्ञान की रश्मियाँ (स्युः) = हों । अर्थात् उन्हें प्रातः- सायं दोनों समय उत्तम ज्ञान प्राप्त कराया जाए। इस ज्ञान के द्वारा उनकी वृत्ति को ठीक करने का प्रयत्न किया जाए। [२] सुधार के लिये आवश्यक है कि उसको पहले वातावरण से अलग किया जाए। इसी दृष्टिकोण से यहाँ कहा गया है कि वे अन्धतमस् से युक्त हों। एकदम उन्हें अलग करके रखा जाए, उनका संसार परिवर्तित ही हो जाए। इसके बाद उन्हें प्रातः - सायं ज्ञान देने का प्रयत्न किया जाए। दिन में विविध कार्यों में व्यापृत रखा जाए। ज्ञान के द्वारा उनके जीवन में पवित्रता के संचार का यत्न हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-औरों को हिंसित व विघ्रित करनेवाले लोगों को समाज से पृथक् करके सुधारने के लिए यत्न हो । उन्हें प्रतिदिन ज्ञान को देने की व्यवस्था की जाए ताकि उनकी प्रवृत्तियाँ परिवर्तित हो जाएँ ।