पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = सब आसुर वृत्तियों के संहार करनेवाले प्रभो ! तेरी (केतुः) = ज्ञानरश्मियाँ (शोशुचत्या उषसः) = वे चारों ओर दीप्ति को फैलाती हुई उषा के समान हैं। उषा के होते ही जैसे अन्धकार समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार हे प्रभो! आपकी प्रेरणा हृदयान्धकार को नष्ट करनेवाली होती है। (ते हेतिः) = तेरा यह ज्ञानवज्र (असिन्) = भेदनरहित होकर (प्रवर्तताम्) = प्रवृत्त हो। इस ज्ञानवज्र का प्रभाव अवश्य होता ही है। [२] (दिवः) = ज्ञान के प्रकाशों को (आसृजान:) = समन्तात् पैदा करता हुआ तू (अश्मा इव) = पत्थर की तरह (विध्य) = इन दुरेव पुरुषों को अशुभ आचरणवाले व्यक्तियों को (विध्य) = विद्ध करनेवाला हो। जैसे पत्थर से एक दुष्ट पुरुष का नाश कर दिया जाता है [stoned to death], इसी प्रकार ज्ञान के द्वारा उसकी दुष्टता को समाप्त करके भी दुष्ट पुरुष का अन्त कर दिया जाता है। [३] तपिष्ठेन = अत्यन्त दीप्त हेषसा [ हेत्या] = शब्दमय वज्र से ज्ञानात्मक वज्र से द्रोघमित्रान् = मित्र द्रोहियों को भी तू बींधनेवाला हो। ज्ञान के द्वारा उनकी मित्रद्रोह की अशुभ भावनाओं को तू विनष्ट कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दुष्ट को पत्थर से मारकर नष्ट करने की अपेक्षा यह अच्छा है कि ज्ञान प्रसार द्वारा उसकी दुष्टता को दूर कर दिया जाए।