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उ॒ताल॑ब्धं स्पृणुहि जातवेद आलेभा॒नादृ॒ष्टिभि॑र्यातु॒धाना॑त् । अग्ने॒ पूर्वो॒ नि ज॑हि॒ शोशु॑चान आ॒माद॒: क्ष्विङ्का॒स्तम॑द॒न्त्वेनी॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

utālabdhaṁ spṛṇuhi jātaveda ālebhānād ṛṣṭibhir yātudhānāt | agne pūrvo ni jahi śośucāna āmādaḥ kṣviṅkās tam adantv enīḥ ||

पद पाठ

उ॒त । आऽल॑ब्धम् । स्पृ॒णु॒हि॒ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । आ॒ऽले॒भा॒नात् । ऋ॒ष्टिऽभिः॑ । या॒तु॒ऽधाना॑त् । अग्ने॑ । पूर्वः॑ । नि । ज॒हि॒ । शोशु॑चानः । आ॒म॒ऽअदः॑ । क्ष्विङ्काः॑ । तम् । अ॒द॒न्तु॒ । एनीः॑ ॥ १०.८७.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:87» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:6» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः-अग्ने) हे प्राप्त अवसर को जाननेवाले अग्रणी सेनानायक ! (आलब्धं स्पृणुहि) प्राप्त स्वराज्य के आलम्भक यातनाधारक शत्रु से (ऋष्टिभिः) हिंसक शस्त्रास्त्रों से प्राप्त को भी सेवन कर (शोशुचानः) तेज से देदीप्यमान प्रमुख हुआ (नि जहि) नितान्त नष्ट कर (आमादः क्ष्विङ्काः-एनीः) अपक्व मांसभक्षणशील शब्द करनेवाली चरनेवाली वनचर जन्तुजातियाँ (तम्-अदन्तु) उनको खावें ॥७॥
भावार्थभाषाः - सेनानायक प्राप्त स्वराज्य को स्वाधीनता से सेवन करे और आक्रमणकारी शत्रु से शस्त्रों के बल पर प्राप्त किये गये धन का भी सेवन करे। इस प्रकार तेजस्वी सेनानी शत्रुओं का नाश करे कि घूमते-फिरते भाँति-भाँति शब्द करते हुए वनचर जन्तु उनका भक्षण कर जाएँ ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अपरिपक्वता को दूर करनेवाली ज्ञान की वाणियाँ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो ! गत मन्त्र के अनुसार आप मेरी बुद्धि को तीव्र करिये (उत) = और (आलेभानात्) = पकड़ लेनेवाले (यातुधानात्) = पीड़ा के कारणभूत राक्षसी भाव से (आलब्धम्) = पकड़े हुए मुझे आप (ॠष्टिभिः) = [ऋष गतौ, ऋषि दर्शनात्] क्रियाशीलता व ज्ञानरूप अस्त्रों के द्वारा (स्पृणुहि) = रक्षित करिये। मैं ज्ञान प्राप्ति में लगा हुआ होकर तथा क्रियाशील बनकर अपने को वासनाओं का शिकार होने से बचाऊँ । [२] अग्ने - हे अग्रेणी प्रभो ! (शोशुचानः) = ज्ञान से दीप्त होते हुए आप मुझे भी इस ज्ञान दीप्ति को प्राप्त कराने के द्वारा (पूर्वः) = [ पृ पालनपूरणयोः] मेरा पालन व पूरण करनेवाले होते हुए (निजहि) = इन राक्षसी भावों को नष्ट कर दीजिये । [३] (आमादः) = [आम अद्] कच्चेपन को समाप्त कर देनेवाली (एनी:) = उज्वल - शुभ्र (क्ष्विङ्काः) = ज्ञान की वाणियाँ (तम्) = उस राक्षसी भाव को (अदन्तु) = खा जाएँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे अशुभ भाव दूर होकर हमारे जीवनों में शुद्ध भावों का वर्धन हो। ये ज्ञान की वाणियाँ हमारी अपरिपक्वता को दूर कर दें । परिपक्व विचारों के बनकर हम इन अशुभ वासनाओं में न फँस जाएँ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः-अग्ने) हे प्राप्तावसरस्य वेत्तः ! अग्रणीः सेनानायक ! (आलब्धम्  स्पृणुहि) प्राप्तं गृहीतं स्वराज्यं सेवस्व “स्पृ प्रीतिसेवनयोः” [स्वादि०] (उत) अपि च (आलेभानात्-यातुधानात्) स्वराज्यस्यालम्भकात् खलु यातनाधारकात् शत्रोः (ऋष्टिभिः) हिंसकशस्त्रास्त्रैः “ऋष्टयः शस्त्रास्त्राणि” [ऋ० १।५।५४ दयानन्दः] लब्धमपि सेवस्वेत्यर्थः (शोशुचानः) तेजसा देदीप्यमानः प्रमुखः सन् (नि जहि) नितान्तं नाशय (आमादः क्ष्विङ्काः-एनीः-तम्-अदन्तु) अपक्वमांस-भक्षणशीलाः शब्दकारिण्यो गन्त्र्यो वनचरजातयस्तान् भक्षयन्तु ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, first and foremost power, bright and blazing, knowing and commanding over everything born, with the strike of your force, power and punishment, release the innocents caught up in the clutches of the forces of violence and terror, destroy the carnivorous, blood suckers and eaters into the flesh, and let them be thrown to the vociferous vultures.