प्रेरणा व ज्ञान का प्राप्त कराना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! अथवा राष्ट्र की अग्रगति को करनेवाले राजन् ! आप (यज्ञैः) = कर्मों से (इषू:) = प्रेरणाओं को (संनममान:) = प्रेरित कराते हुए और (अशनिभिः) = [a mester] आचार्यों के द्वारा (वाचा) = ज्ञान की वाणियों से (शल्यान्) = [any caure of heart rendive griey] हृदयवेधी भावनाओं को (दिहान:) = बढ़ाते हुए, (ताभिः) = उन प्रेरणाओं से तथा ज्ञान-वाणियों से (यातुधानान्) = प्रजा पीड़कों को (हृदये विध्य) = हृदय में विद्ध करिये। इनके हृदयों में ही इनके अपने काम चुभने लगे। इन्हें औरों के उत्तम कर्मों से ऐसी प्रेरणा मिले कि ये यातुधानत्व को छोड़कर पवित्र कर्मों की ओर झुक जाएँ और ज्ञान की वाणियाँ इनके हृदयों में इस प्रकार की तीव्र वेदना को उत्पन्न करें कि इनका हृदय तीव्र प्रायश्चित की भावनावाला हो उठे। [२] इस प्रकार इन्हें पापों के प्रति तीव्र वेदनावाला करके (एषाम्) = इनकी (प्रतीच: बाहून्) = पापकर्म में प्रवृत्त [ turned away = धर्ममार्ग से दूर गई हुई] बाहुओं को (भङ्ग्धि) = तोड़ दे । पाप कर्म करने की इनमें हिम्मत ही न रहे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा उत्तम कर्मों के द्वारा तथा ज्ञान प्रसाद के द्वारा यातुधानों के हृदय में ऐसी शुभ पैदा करे कि वे पापकर्म से घृणा करनेवाले बनकर, उनके लिये प्रायश्चित करके, पवित्र हो जाएँ।