ब्रह्म व क्षत्र के द्वारा काम-क्रोध का विनाश
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (उभयाविन्) = ब्रह्म और क्षत्र-ज्ञान व शक्ति दोनों से सम्पन्न प्रभो ! हे सर्वज्ञ सर्वशक्तिमन् प्रभो! (उभा) = हमारे दोनों शत्रुओं को, काम-क्रोध को [तौ ह्यस्य परिपन्यिनौ] (दंष्ट्रा उपधेहि) = अपनी दाढ़ों में धारण करिये, अर्थात् ज्ञान को देकर हमारी कामवासना को समाप्त करिये और हमें शक्ति- सम्पन्न करके क्रोध से ऊपर उठाइये । ज्ञानाग्नि काम को दग्ध करती है और शक्ति मनुष्य को क्रोध से ऊपर उठाती है । हे प्रभो! आप (शिशान:) = हमारी बुद्धि को तीव्र करते हुए (अवरं परं च) = इस काम को और कामोत्पन्न क्रोध को [ कामात् क्रोधोऽभिजायते] (हिंस्रः) = नष्ट करनेवाले होते हैं। काम को यहाँ अवर कहा है। यह हीनता का कारण होता है, क्रोध को 'पर' कहने का कारण यही है कि यह काम से उत्पन्न होता है, पीछे होने के कारण यह 'पर' है । [२] हे (राजन्) = हमारे जीवनों को व्यवस्थित करनेवाले ज्ञानदीप्त प्रभो ! (उत) = और आप (अन्तरिक्षे) = हमारे हृदयान्तरिक्ष में (परियाहि) = परितः गति करनेवाले होइये । आपका निवास हमारे हृदय में हो और वहाँ (यातु-धानान्) = हमें पीड़ित करनेवाली वासनाओं को (जम्भैः) = अपनी दंष्ट्राओं से (अभिसन्धेहि) = युक्त करिये। अर्थात् इन सब वासनाओं को आप नष्ट करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु 'ब्रह्म और क्षत्र' की चरमसीमा हैं। वे ज्ञान के द्वारा हमारे 'काम' को तथा शक्ति के द्वारा 'क्रोध' को नष्ट करें।