पदार्थान्वयभाषाः - [१] हमारे जीवनों में 'काम-क्रोध' प्रायः साथ-साथ चलते हैं, 'कामात् क्रोधोऽभिजायते', क्रोध तो पैदा ही काम से होता है। इसी प्रकार 'लोभ मोह' का द्वन्द्व है। जिस भी वस्तु का लोभ होता है, उसी के प्रति मोह उत्पन्न हो जाता है। 'मद मत्सर' भी द्वन्द्वात्मक हैं, जब मद होता है तभी मत्सर भी आता है। हे (अग्ने) = प्रकाशमय प्रभो ! इन (मिथुना) = द्वन्द्वभूत (किमीदिना) ='किम् इदानीम् अद्मः अब क्या खायें और अब क्या खायें' इस वृत्तिवाले (यातुधाना) = औरों को पीड़ित करनेवाले राक्षसी भावों को (प्रतिदह) = भस्म कर दीजिये । [२] जीव की इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु कहते हैं कि मैं (त्वा) = तुझे संशिशामि तीव्र बुद्धिवाला करता हूँ, जागृहि तू जाग और इन वासनाओं को आक्रमण का अवसर ही न दे। उनके आक्रमण होने पर भी इस तीव्र बुद्धि से उनको भस्म करनेवाला बन । हे (विप्र) = अपना पूरण करनेवाले जीव ! मैं तुझे (मन्यभिः) = ज्ञानपूर्वक किये गये इन स्तवनों के द्वारा (अदब्धम्) = अहिंसित बनाता हूँ। जो भी प्रभु का नामस्मरण करता है, उसके अर्थ का चिन्तन करता है, वह वासनाओं से आक्रान्त नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - तीव्र बुद्धि से, सदा सावधान रहने से तथा समझ के साथ प्रभु नामस्मरण से हम वासनाओं का विनाश करें।