व्यापक ज्ञान व सूर्यवत् गति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = प्रकाशमय प्रभो! आप (विषेण) = [विष् व्याप्तौ] व्यापक ज्ञान के द्वारा (भङ्गुरावतः) = हमारी शक्तियों का भंग करनेवाली (रक्षसः) = राक्षसी वृत्तियों को (प्रति दह स्म) = निश्चय से एक-एक करके भस्म कर दीजिये। ज्ञानाग्नि से वासनाएँ जल जाती हैं। [२] (तिग्मेन शोचिषा) = तीव्र ज्ञान की ज्योति से तथा (तपुः अग्राभिः) = [तपुः = the sun ] सूर्य है अग्रभाग में जिनके ऐसी (ॠष्टिभिः) = [ऋष् गतौ] गतियों से हमारी राक्षसी वृत्तियों का दहन करिये। सूर्य को सन्मुख रख के अर्थात् सूर्य को आदर्श मानकर की जानेवाली गतियाँ 'तपुरग्रा ऋष्टियाँ' हैं । 'सूर्याचन्द्रमसाविव' = सूर्य और चन्द्रमा की तरह नियमित गतियों से अशुभवृत्तियाँ दूर हो जाती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-व्यापक व दीप्त ज्ञान से तथा सूर्य की तरह नियमित गति से हम अशुभवृत्तियों का दहन करनेवाले हों ।