वांछित मन्त्र चुनें

प॒श्चात्पु॒रस्ता॑दध॒रादुद॑क्तात्क॒विः काव्ये॑न॒ परि॑ पाहि राजन् । सखे॒ सखा॑यम॒जरो॑ जरि॒म्णेऽग्ने॒ मर्ताँ॒ अम॑र्त्य॒स्त्वं न॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

paścāt purastād adharād udaktāt kaviḥ kāvyena pari pāhi rājan | sakhe sakhāyam ajaro jarimṇe gne martām̐ amartyas tvaṁ naḥ ||

पद पाठ

प॒श्चात् । पु॒रस्ता॑त् । अ॒ध॒रात् । उद॑क्तात् । क॒विः । काव्ये॑न । परि॑ । पा॒हि॒ । रा॒ज॒न् । सखे॑ । सखा॑यम् । अ॒जरः॑ । ज॒रि॒म्णे । अग्ने॑ । मर्ता॑न् । अम॑र्त्यः । त्वम् । नः॒ ॥ १०.८७.२१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:87» मन्त्र:21 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:9» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:21


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने राजन्) हे अग्रणायक सर्वत्र राजमान-विराजमान-परमात्मन् ! (कविः काव्येन) तू शास्त्रकलाविज्ञ होता हुआ शास्त्रकलाप्रकार से (पश्चात्) पश्चिम से (पुरस्तात्) पूर्व से (अधरात्) दक्षिण से (उदक्तात्) उत्तर से (परि पाहि) परिपालन कर (सखे) हे मित्र ! (सखायम्) मुझ मित्र को (अजरः) जरारहित हुआ (जरिम्णे) जरा भाव-जब तक जरा हो-जरापर्यन्त (अमर्त्य) हे मरणधर्मरहित (मर्त्यान्) मरणधर्मवाले (नः) हमें (त्वम्) तू परिपालित कर ॥२१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अपने उपासकों की समस्त दिशाओं से रक्षा करता है, जरापर्यन्त जीवन प्रदान करता है ॥२१॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रक्षण व पूर्ण जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (राजन्) = ज्ञानदीप्त प्रभो ! अथवा ब्रह्माण्ड के नियमित [reguleted] करनेवाले प्रभो ! आप (कविः) = क्रान्तदर्शी तत्त्वज्ञानी हैं। आप (काव्येन) = इस वेदरूप अजरामर काव्य के द्वारा [पश्यदेवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति] पश्चात् (पुरस्तात्) = पीछे व आगे से, पश्चिम व पूर्व से (अधरात् उदक्तात्) = नीचे व ऊपर से, दक्षिण व उत्तर से हमें (परिपाहि) = रक्षित करिये। आपके इस काव्य की प्रेरणा के अनुसार चलते हुए हम सदा सुरक्षित जीवन बिता पायें। [२] हे (सखे) = मित्र प्रभो! आप (सखायम्) = अपने सखा मुझको रक्षित करिये। 'मित्र' मित्र का रक्षण करता ही है, मित्र का मित्रत्व है ही यह कि वह रक्षण करता है 'प्रमीतेः त्रायते' । [३] हे (अग्ने) = सब रोगों व पापों से बचाकर आगे ले चलते हुए (त्वम्) = आप न हमें (अजर:) = अजर - जरारहित होते हुए (जरिम्णे) = पूर्ण जरावस्थावाले दीर्घजीवन के लिये प्राप्त कराइये । (अमर्त्यः) = आप अमर्त्य हैं । हम (मर्तान्) = मरणधर्मा अपने मित्रों को आप पूर्ण जीवनरूप अमरता को प्राप्त करानेवाले हों। आपके मित्र बनकर हम पूरे सौ वर्ष तक जीनेवाले बनें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें वेदरूप काव्य के द्वारा पाप से बचाकर पूर्ण जीवन प्राप्त करायें ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने राजन्) हे तेजस्विन् राजमान नायक ! (कविः काव्येन) त्वं शास्त्रकलाविज्ञः सन् शास्त्रकलाप्रकारेण (पश्चात्) पश्चिमतः (पुरस्तात्) पूर्वदिक्तः (अधरात्) दक्षिणतः (उदक्तात्) उत्तरतः (परि पाहि) परिपालय (सखे) हे सखे ! (सखायम्) सखायं मां (अजरः) जरारहितः सन् (जरिम्णे) जराभावाय यावज्जरा-जरापर्यन्तं (अमर्त्य) हे मरणधर्मरहित ! (मर्त्यान्) मरणधर्मवतः (नः) अस्मान् (त्वं) त्वं परिपालय ॥२१॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O refulgent ruler, divine visionary, protect us all round, from the back and front, from above and below, as now and hereafter, by the light of your vision and wisdom. O Agni, unaging friend, immortal divinity, save the mortals, save your friend, bless us all mortals to live a happy life till a full age of fulfilment.