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सं॒व॒त्स॒रीणं॒ पय॑ उ॒स्रिया॑या॒स्तस्य॒ माशी॑द्यातु॒धानो॑ नृचक्षः । पी॒यूष॑मग्ने यत॒मस्तितृ॑प्सा॒त्तं प्र॒त्यञ्च॑म॒र्चिषा॑ विध्य॒ मर्म॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

saṁvatsarīṇam paya usriyāyās tasya māśīd yātudhāno nṛcakṣaḥ | pīyūṣam agne yatamas titṛpsāt tam pratyañcam arciṣā vidhya marman ||

पद पाठ

स॒व्ँम्व॒त्स॒रीण॑म् । पयः॑ । उ॒स्रिया॑याः । तस्य॑ । मा । अ॒शी॒त् । या॒तु॒ऽधानः॑ । नृ॒ऽच॒क्षः॒ । पी॒यूष॑म् । अ॒ग्ने॒ । य॒त॒मः । तितृ॑प्सात् । तम् । प्र॒त्यञ्च॑म् । अ॒र्चिषा॑ । वि॒ध्य॒ । मर्म॑न् ॥ १०.८७.१७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:87» मन्त्र:17 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:17


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नृचक्षः-अग्ने) हे मनुष्यों के कर्मद्रष्टा नायक ! (यातुधानः) पीड़ा देनेवाले दुष्ट मनुष्य (उस्रियायाः-संवत्सरीणं तस्य पयः) गौ का वर्षपर्यन्त-वर्ष भर उस दूध को (मा-अशीत्) न पीवे, ऐसा उसे दण्ड दे (पीयूषं यतमः-तितृप्सात्) उस अमृतरूप दूध से अपने को जो तृप्त करना चाहे, (तं प्रत्यञ्चम्) उसे सबके प्रत्यक्ष-सम्मुख (अर्चिषा मर्मन् विध्य) ज्वाला अस्त्र से मर्म में बींधे-ताड़ित करे ॥१७॥
भावार्थभाषाः - सबके व्यवहारों को देखनेवाला नायक पीड़ा देनेवाले को गौ का दूध वर्ष भर तक न पीने दे। जो उस अमृतरूप दूध को पीकर अपने को तृप्त करना चाहे, उस ऐसे पीड़क जन को दूसरों के सम्मुख तीक्ष्ण शस्त्र से ताड़ित करे ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गोपीड़क को दण्ड

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (नृचक्षः) = मनुष्यों का ध्यान करनेवाले प्रजापालक राजन् ! (यातुधानः) = गौ को पीड़ित करके उसके दूध को छीननेवाला यातुधान (उस्त्रियायाः) = गौ का जो (संवत्सरीणं पयः) = वर्षभर में मिलनेवाला दूध है (तस्य मा आशीत्) = उसका भोजन न करे। उस यातुधान को वर्षभर गौ का दूध पीने को न मिले। वह गौ की सेवा करे, पर उसे गौ के दूध से वञ्चित रखा जाये । क्रूरता से दुग्धहरण का यही समुचित दण्ड है । [२] (यतमः) = जो भी यातुधान (अग्ने) = हे राजन् ! (पीयूषम्) = अभिनव पय को शुरू-शुरू में स्तनों से बाहर आनेवाले दूध को जो वस्तुतः बछड़े का भाग है, उस दूध को (तृप्सात्) = अपनी तृप्ति का साधन बनाने की इच्छा करता है (तम्) = उस (प्रत्यञ्चम्) = प्रतिकूल मार्ग पर चलनेवाले व्यक्ति को (अर्चिषा) = ज्ञान ज्वाला से (मर्मन्) = मर्मस्थल में (विध्य) = तू विद्ध करनेवाला बन । उसे तू इस प्रकार के शब्दों में समझाने का प्रयत्न कर कि 'बच्चे भूखे बैठे हों और मात-पिता मजे से खा रहे हों, तो क्या यह दृश्य माता-पिता की मानवता का सूचक है ! इसी प्रकार गौ का बछड़ा तरसता रह जाये और तुम गौ के अधस् से एक-एक बूंद दूध को निकालने का प्रयत्न करो तो यह कहाँ तक ठीक है ? इस प्रकार उसे ज्ञान दिया जाए कि यह उसके हृदय में घर कर जाये । उसे अपना अपराध मर्मविद्ध करने लगे। I
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पीड़ा देकर गोदुग्ध हरण करनेवाले को वर्षभर दूध न मिल सकने का दण्ड दिया जाये ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नृचक्षः-अग्ने) हे नराणां कर्मद्रष्टः नायक ! (यातुधानः) यातनाधारको दुष्टो जनः (उस्रियायाः संवत्सरीणं तस्य पयः मा अशीत्) गोः-उस्रा “गोनाम” [निघ० २।११] ततो डियाप्रत्ययश्छान्दसः संवत्सरे भवं पूर्णवर्षान्तं तद् “व्यत्ययेन षष्ठी” दुग्धं न अश्नीयात् न पिबेदिति दण्डं प्रयच्छ (पीयूषं-यतमः-तितृप्सात्) पीयूषेण “विभक्तिव्यत्ययेन द्वितीया” अमृतकल्पेन दुग्धेन स्वात्मानं तर्पयितुमिच्छेद् यः (तं प्रत्यञ्चम्-मर्मन्-अर्चिषा विध्य) तं सर्वप्रत्यक्षं ज्वालास्त्रेण मर्मणि विध्य-ताडय ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, watchful guardian of humanity, let the oppressor not drink milk of the cow for a year, and if the oppressor drinks of the milk and excessively too, punish him with your flame unto the heart core.