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यः पौरु॑षेयेण क्र॒विषा॑ सम॒ङ्क्ते यो अश्व्ये॑न प॒शुना॑ यातु॒धान॑: । यो अ॒घ्न्याया॒ भर॑ति क्षी॒रम॑ग्ने॒ तेषां॑ शी॒र्षाणि॒ हर॒सापि॑ वृश्च ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaḥ pauruṣeyeṇa kraviṣā samaṅkte yo aśvyena paśunā yātudhānaḥ | yo aghnyāyā bharati kṣīram agne teṣāṁ śīrṣāṇi harasāpi vṛśca ||

पद पाठ

यः । पौरु॑षेयेण । क्र॒विषा॑ । स॒म्ऽअ॒ङ्क्ते । यः । अश्व्ये॑न । प॒शुना॑ । या॒तु॒ऽधानः॑ । यः । अ॒घ्न्यायाः॑ । भर॑ति । क्षी॒रम् । अ॒ग्ने॒ । तेषा॑म् । शी॒र्षाणि॑ । हर॑सा । अपि॑ । वृ॒श्च॒ ॥ १०.८७.१६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:87» मन्त्र:16 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:16


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे तेजस्वी नायक ! (यः-यातुधानः) जो यातनाधारक दुष्ट प्राणी है (पौरुषेयेण क्रविषा) मनुष्य के अन्दर होनेवाले मांस से (समङ्क्ते) अपने को पुष्ट करता है (यः-अश्व्येन पशुना) जो भी पशुओं में साधु पशु के द्वारा सम्पुष्ट करता है (यः-अघ्न्यायाः क्षीरं भरति) जो अहन्तव्य गौ के दूध को हरता है-नष्ट करता है-दूषित करता है (तेषां शीर्षाणि हरसा वृश्च) उनके शिरों को या उनके शिरवत् वर्तमान प्रमुख जनों को हरणकारक शस्त्र-अस्त्र साधन से छिन्न-भिन्न कर, नष्ट कर ॥१६॥
भावार्थभाषाः - तेजस्वी नायक को चाहिए कि जो राष्ट्र में पीड़ा पहुँचानेवाले प्राणी मनुष्य के मांस को खाकर अपने को पुष्ट करते हैं या अच्छे घोड़ों को नष्ट करते हैं, गौवों के दूध छीनते-सुखाते हैं-दूषित करते हैं उनके शिरों और उनके प्रमुख जनों को नष्ट करे ॥१६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क्रूरता को रोकना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = राजन् ! (तेषाम्) = उनके (शीर्षाणि) = सिरों को (हरसा) = अपने ज्वलित तेज से (वृश्च) = तू छिन्न करनेवाला हो । अर्थात् इनको उचित दण्ड देकर उनके अपवित्र कार्यों से उन्हें रोक । सबसे प्रथम उसको रोक (यः) = जो (पौरुषेयेण) = पुरुष सम्बन्धी (क्रविषा) = मांस से (समङ्क्ते) = अपने को संगत करता है। नर-मांस के वर्धन की कामना करता है । [२] (यः) = जो (अश्व्येन) = घोड़े के मांस से अपने को संगत करता है घोड़े के मांस को खाता है अथवा घोड़े को दिन-रात जोते रखकर अपने भोग बढ़ाने का यत्न करता है । (यः यातुधानः) = जो औरों को पीड़ित करनेवाला (पशुना) = अन्य पशुओं से, अन्य पशुओं को पीड़ित करके अपने धन को बढ़ाना चाहता है, गधे आदि पर अधिक बोझ लादकर अपनी अतिरिक्त आजीविका सिद्ध करने के लिये यत्नशील होता है। [३] और (यः) = जो (अघ्न्यायाः) = अहन्तव्य गौ के (क्षीरम्) = दूध को (भरति) = दोहने की बजाय पीड़ित करके हरना चाहता है [हरति- भरति ] । बछड़े को भी उचित मात्रा में दूध न देकर जो सारे दूध को ले लेने की कामना करता है उसे राजा दण्ड देकर इस अपराध से रोके। मनुष्यों पर, घोड़ों पर, अन्य पशुओं पर तथा गौवों पर होनेवाली क्रूरता को दूर करना यह राज कर्त्तव्य है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजनियम ऐसा हो कि कोई भी मनुष्य अन्य मनुष्यों पर, घोड़े व अन्य पशुओं पर व गौवों पर क्रूरता न कर सके ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे तेजस्विन् नायक ! (यः-यातुधानः) यो यातनाधारको दुष्टः प्राणी (पौरुषेयेण क्रविषा) पुरुषे भवेन मांसेन-अन्नभूतेन “क्रविषः क्रमितुं योग्यस्यान्नस्य” [ऋ० १।१५१।१० दयानन्दः] (समङ्क्ते) स्वात्मानं सम्पोषयति (यः अश्व्येन पशुना) योऽपि खल्वश्वेषु साधुना पशुना सम्पोषयति हृत्वा समलङ्करोति वा (यः-अघ्न्यायाः क्षीरं भरति) योहन्तव्याया गोर्दुग्धं हरति नाशयति दूषयति (तेषां शीर्षाणि हरसा वृश्च) तेषां शिरांसि शिरोवद्वर्त्तमानान् प्रमुखान् जनान् हरणकारकेण शस्त्रास्त्रसाधनेन छिन्धि ॥१६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Whoever feeds himself upon the flesh of humanity, whoever prospers by animal wealth at the cost of animal wealth by destroying it, whoever carries off the milk of the inviolable cow and destroys the fertility of the earth, O Agni, strike off their heads with light and passion for truth.