पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = राजन् ! (तेषाम्) = उनके (शीर्षाणि) = सिरों को (हरसा) = अपने ज्वलित तेज से (वृश्च) = तू छिन्न करनेवाला हो । अर्थात् इनको उचित दण्ड देकर उनके अपवित्र कार्यों से उन्हें रोक । सबसे प्रथम उसको रोक (यः) = जो (पौरुषेयेण) = पुरुष सम्बन्धी (क्रविषा) = मांस से (समङ्क्ते) = अपने को संगत करता है। नर-मांस के वर्धन की कामना करता है । [२] (यः) = जो (अश्व्येन) = घोड़े के मांस से अपने को संगत करता है घोड़े के मांस को खाता है अथवा घोड़े को दिन-रात जोते रखकर अपने भोग बढ़ाने का यत्न करता है । (यः यातुधानः) = जो औरों को पीड़ित करनेवाला (पशुना) = अन्य पशुओं से, अन्य पशुओं को पीड़ित करके अपने धन को बढ़ाना चाहता है, गधे आदि पर अधिक बोझ लादकर अपनी अतिरिक्त आजीविका सिद्ध करने के लिये यत्नशील होता है। [३] और (यः) = जो (अघ्न्यायाः) = अहन्तव्य गौ के (क्षीरम्) = दूध को (भरति) = दोहने की बजाय पीड़ित करके हरना चाहता है [हरति- भरति ] । बछड़े को भी उचित मात्रा में दूध न देकर जो सारे दूध को ले लेने की कामना करता है उसे राजा दण्ड देकर इस अपराध से रोके। मनुष्यों पर, घोड़ों पर, अन्य पशुओं पर तथा गौवों पर होनेवाली क्रूरता को दूर करना यह राज कर्त्तव्य है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजनियम ऐसा हो कि कोई भी मनुष्य अन्य मनुष्यों पर, घोड़े व अन्य पशुओं पर व गौवों पर क्रूरता न कर सके ।