'तप, तेज व ज्योति' से पाप का दूर करना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तपसा) = तप के द्वारा (यातुधानान्) = पीड़ा के देनेवालों को (पराशृणीहि) = सुदूर विनष्ट कर। जिस समय जीवन में तप की कमी आती है, भोगवृत्ति बढ़ती है, उसी समय मनुष्य औरों को पीड़ित करनेवाला बनता है । यदि प्रजा में तपस्या की भावना बनी रहे, तो उनके जीवनों में 'यातुधानत्व' आता ही नहीं । [२] हे (अग्ने) = राजन् ! (हरसा) = [ ज्वालितेन तेजसा द० १३ । ४१] तेजस्विता के द्वारा (रक्षः) = राक्षसी वृत्तिवालों को (पराशृणीहि) = सुदूर विशीर्ण करनेवाले होइये । तेजस्विता अशुभ वृत्तियों को विनष्ट करनेवाली है। तेजस्वी पुरुष रमण व मौज की वृत्ति से ही ऊपर उठ जाता है, सो उसे औरों के क्षय करने का विचार ही नहीं उठता। [३] (अर्चिषा) = ज्ञान की ज्वाला से मूरदेवान् मूर्खतापूर्ण व्यवहार करनेवालों को पराशृणीहि नष्ट करिये। ज्ञान के प्रसार के द्वारा मूर्खता के नष्ट होने पर सब व्यवहार विवेक व सभ्यता के साथ होने लगते हैं । [४] हे राजन् ! (अभि शोशुचानः) = आन्तरिक व बाह्य पवित्रता को करता हुआ अथवा प्रकृतिविद्या व आत्मविद्या दोनों की दीप्ति को करता हुआ तू (असुतृपः) = केवल अपने प्राणों के तृप्त करने में लगे हुए लोगों को (परा) = दूर कर । आत्मविद्या इन्हें केवल निजू प्राणतृप्ति से ऊपर उठाये। ये जीवन का लक्ष्य 'आत्म-प्राप्ति' को बनाकर केवल प्राणपोषण की प्रवृत्ति से ऊपर उठनेवाले हों । यद्यपि ये ' असुतृप' समाज को इतनी हानि नहीं पहुँचाते जितनी कि 'यातुधान, रक्षस् व मूरदेव' पहुँचाते हैं, तथापि सम्पूर्ण राष्ट्र की उन्नति के लिये ऐसे लोगों का न होना आवश्यक ही है । विनाश हो, तेजस्विता से राक्षसीवृत्ति का विलोप हो
भावार्थभाषाः - भावार्थ - तप के द्वारा यातुधानत्व का और ज्ञान -प्रसार से मूरदेवत्व का मरण हो । प्रकृतिविद्या के साथ आत्मविद्या के उपदेश से मनुष्य असुतृप ही बने रहने से ऊपर उठें।