पति-पत्नी व मित्रों को कटु शब्दों के लिये वाग्दण्ड
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = राजन् ! (यद्) = जो (अद्य) = आज (मिथुना) = पति-पत्नी परस्पर (शपातः) = एक दूसरे को आकृष्ट करनेवाले होते हैं, परस्पर अपशब्द बोल बैठते हैं और क्रोध में आकर राजाधिकरण में [न्यायालय में] आते हैं । [२] (यत्) = जो (रेभाः) = बहुत बोलने के स्वभाववाले मित्र (वाच:) = वाणी के (तृष्टम्) = [hoarse, rugged, harsh, pungent] कटुता को (जनयन्त) = उत्पन्न करते हैं, अर्थात् बात-बात में तेजी में आ बैठते हैं और कड़वे शब्दवाले बैठते हैं और राजाधिकरण में आते हैं । [३] इन (यातुधानान्) = एक दूसरे को पीड़ित करनेवालों को (तया) = उस वाणी से हृदये (विध्य) = हृदय में विद्ध कर (या) = जो वाणी (मन्योः) = कुछ भी विचारशील पुरुष के (मनसः) = मन के लिये (शरव्या जायते) = वाण समूह बन जाती है। अर्थात् इन व्यक्तियों के हृदय में वे शब्द चुभते हैं और उनके अन्दर कुछ आत्मग्लानि पैदा करते हैं और उन्हें अपने कर्म के लिये पश्चात्तापयुक्त करते हैं । [४] पति-पत्नी परस्पर कुछ कटु बोल बैठें और यदि मित्र आपस में लड़ पड़ें तो राजा को उन्हें वाग्दण्ड देकर उस बात के लिये कुछ शर्मिन्दा कर देना ही ठीक है। उन्हें इस प्रकार धिक्कृत कर देना कि वे कुछ अपने दिलों में हो गई गलती को महसूस करे और आगे से वैसी गलती न करने का सङ्कल्प करें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति-पत्नी परस्पर कटु शब्द बोल बैठें या मित्र परस्पर तेजी में अशुभ शब्द बोल जाएँ तो राजा उन्हें वाग्दण्ड द्वारा भविष्य में वैसा न करने के लिये प्रेरित करे।