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यद॑ग्ने अ॒द्य मि॑थु॒ना शपा॑तो॒ यद्वा॒चस्तृ॒ष्टं ज॒नय॑न्त रे॒भाः । म॒न्योर्मन॑सः शर॒व्या॒३॒॑ जाय॑ते॒ या तया॑ विध्य॒ हृद॑ये यातु॒धाना॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad agne adya mithunā śapāto yad vācas tṛṣṭaṁ janayanta rebhāḥ | manyor manasaḥ śaravyā jāyate yā tayā vidhya hṛdaye yātudhānān ||

पद पाठ

यत् । अ॒ग्ने॒ । अ॒द्य । मि॒थु॒ना । शपा॑तः । यत् । वा॒चः । तृ॒ष्टम् । ज॒नय॑न्त । रे॒भाः । म॒न्योः । मन॑सः । श॒र॒व्या॑ । जाय॑ते । या । तया॑ । वि॒ध्य॒ । हृद॑ये । या॒तु॒ऽधाना॑न् ॥ १०.८७.१३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:87» मन्त्र:13 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:13


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे तेजस्वी नायक ! (यत्-अद्य) जब आज-इस समय (मिथुना शपातः) दो परस्पर शब्द करते हैं (यत्) या जब (रेभाः) बहुत शब्दायमान (वाचः तृष्टं जनयन्त) वाणी के तृष्णाजनक वचन कटु वचन को उत्पन्न करते हैं, उस अवसर पर जो मन्यु उत्पन्न होता है (मन्योः-मनसः) मन्युरूप मन से (शरव्या या जायते) जो इषु-बाण तैयार होता है, (तया यातुधानान् हृदये विध्य) उससे पीड़ा देनेवालों को हृदय में ताड़ित कर ॥१३॥
भावार्थभाषाः - कटु वचन बोलनेवालों के हृदय में शस्त्र के द्वारा बींध देना चाहिये ॥१३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पति-पत्नी व मित्रों को कटु शब्दों के लिये वाग्दण्ड

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = राजन् ! (यद्) = जो (अद्य) = आज (मिथुना) = पति-पत्नी परस्पर (शपातः) = एक दूसरे को आकृष्ट करनेवाले होते हैं, परस्पर अपशब्द बोल बैठते हैं और क्रोध में आकर राजाधिकरण में [न्यायालय में] आते हैं । [२] (यत्) = जो (रेभाः) = बहुत बोलने के स्वभाववाले मित्र (वाच:) = वाणी के (तृष्टम्) = [hoarse, rugged, harsh, pungent] कटुता को (जनयन्त) = उत्पन्न करते हैं, अर्थात् बात-बात में तेजी में आ बैठते हैं और कड़वे शब्दवाले बैठते हैं और राजाधिकरण में आते हैं । [३] इन (यातुधानान्) = एक दूसरे को पीड़ित करनेवालों को (तया) = उस वाणी से हृदये (विध्य) = हृदय में विद्ध कर (या) = जो वाणी (मन्योः) = कुछ भी विचारशील पुरुष के (मनसः) = मन के लिये (शरव्या जायते) = वाण समूह बन जाती है। अर्थात् इन व्यक्तियों के हृदय में वे शब्द चुभते हैं और उनके अन्दर कुछ आत्मग्लानि पैदा करते हैं और उन्हें अपने कर्म के लिये पश्चात्तापयुक्त करते हैं । [४] पति-पत्नी परस्पर कुछ कटु बोल बैठें और यदि मित्र आपस में लड़ पड़ें तो राजा को उन्हें वाग्दण्ड देकर उस बात के लिये कुछ शर्मिन्दा कर देना ही ठीक है। उन्हें इस प्रकार धिक्कृत कर देना कि वे कुछ अपने दिलों में हो गई गलती को महसूस करे और आगे से वैसी गलती न करने का सङ्कल्प करें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति-पत्नी परस्पर कटु शब्द बोल बैठें या मित्र परस्पर तेजी में अशुभ शब्द बोल जाएँ तो राजा उन्हें वाग्दण्ड द्वारा भविष्य में वैसा न करने के लिये प्रेरित करे।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे तेजस्विन् नायक ! (यत्-अद्य) यदास्मिन् समये (मिथुना शपातः) द्वौ परस्परमपशब्दं ब्रूतः (यत्) यदा वा (रेभाः) बहुशब्दायमानाः “रेभृ शब्दे” [भ्वादि०] (वाचः तृष्टं जनयन्त) वाण्या तृष्णाजनकं वचनं कटुवचनं जनयन्ति तदवसरे यो मन्युर्जायते (मन्योः-मनसः) मन्युभूतस्य मनसः (शरव्या या जायते) या शरव्येषुर्जायते (तया यातुधानान् हृदये विध्य) तया यातनाधारकान् हृदये ताडय ॥१३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, the sharp and shooting words with which fighting rivals revile and execrate, the rough and raging words which the poet creates for irony, the piercing pain that issues forth in words from the mind in a state of passion, with that language chastise and strike the demonic violent deep to the heart core (yourself undisturbed).