'वराह' से मेल [ वराहावतार दर्शन ]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यम्) = जिस (इमम्) = इस (प्रियम्) = अपने कर्मों से आपको प्रीणित करनेवाले अपने हरितत्व और मृगत्व के द्वारा यह प्रभु का प्रिय बनता है । (वृषाकपिम्) = वृषाकपि को (त्वम्) = आप (अभिरक्षसि) = शरीर में रोगों से तथा मन में राग-द्वेष से बचाते हो, (नु) = अब ऐसा होने पर (श्वा) = [ मातरिश्वा] वायु, अर्थात् प्राण (अस्य) = इसके (जम्भिषत्) = सब दोषों को खा जाता है। प्राणसाधना से इसके सब दोष दूर हो जाते हैं। 'प्राणायामैर्दहेद् दोषान्'- प्राणायामों से दोषों को दग्ध कर दे। जैसे 'सत्यभामा' को 'भामा' कहने लगते हैं इसी प्रकार यहाँ 'मातरिश्वा' को 'श्वा' कहा गया है। मातरिश्वा वायु है, अध्यात्म में यह प्राण है। प्राणसाधना से दोष दूर होते ही हैं, मानो प्राण सब दोषों को खा जाते हैं । [२] इतना ही नहीं, (कर्णे) = [कृ विक्षेपे] चित्तवृत्ति के विक्षेप के होने पर यह प्राण (वराहयुः अपि) = [ वरंवरं आहन्ति = प्रापयति] उस श्रेष्ठता को प्राप्त करानेवाले प्रभु से मेल करानेवाले भी हैं। चित्तवृत्ति जब विक्षिप्त हो जाती है उस समय प्राणायाम से इस विक्षेप को दूर करके मन का निरोध होता है और इस प्रकार प्राण हमें उस प्रभु से मिलाते हैं, जो कि 'वराह' हैं, सब वर पदार्थों को प्राप्त करानेवाले हैं। ये (इन्द्रः) = प्रभु (विश्वस्मात्: उत्तर:) = सब से उत्कृष्ट हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभुरक्षण प्राप्त होने पर प्राणसाधना से हम सब दोषों को दूर करके प्रभु से मेलवाले होते हैं।